तब सुमन्त्र नृप-बचन सुनाये । करि बिनती रथ राम चढ़ाये ॥
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई । चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥
taba sumantra nṛpa-bacana sunāye | kari binatī ratha rāma car̤hāye ||
car̤hi ratha sīya sahita dou bhāī | cale hṛdayam̐ avadhahi siru nāī ||
5 श्लोक · 83 में से 326
सुमन्त्र ने राजा का संदेश सुनाया और विनती करके श्रीराम को रथ पर चढ़ाया। सीता सहित दोनों भाई मन ही मन अयोध्या को सिर नवाकर चल पड़े। श्रीराम को जाते देख नगर अनाथ सा हो गया और व्याकुल लोग साथ लग गए। कृपासिन्धु श्रीराम उन्हें बहुत समझाते हैं, वे प्रेम के वश लौटते हैं और फिर लौट आते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि उस समय अवध प्रलय की अँधेरी रात सा भयानक लगने लगा। नर नारी एक दूसरे को देखकर ऐसे डरते मानो भयंकर जन्तु हों। घर श्मशान, परिजन भूत, पुत्र और मित्र यमदूत से लगने लगे। बागों के वृक्ष और बेलें मुरझा गईं, नदी और सरोवर देखे नहीं जाते, और घोड़े, हाथी, पालतू हिरन, मोर, तोते, हंस, चकोर सब शोक में डूब गए।
तब सुमन्त्र नृप-बचन सुनाये । करि बिनती रथ राम चढ़ाये ॥
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई । चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥
taba sumantra nṛpa-bacana sunāye | kari binatī ratha rāma car̤hāye ||
car̤hi ratha sīya sahita dou bhāī | cale hṛdayam̐ avadhahi siru nāī ||
चलत राम लखि अवध अनाथा । बिकल लोग सब लागे साथा ॥
कृपासिन्धु बहुबिधि समुझावहिँ । फिरहिँ प्रेम-बस पुनि फिरि आवहिँ ॥
calata rāma lakhi avadha anāthā | bikala loga saba lāge sāthā ||
kṛpāsindhu bahubidhi samujhāvahim̐ | phirahim̐ prema-basa puni phiri āvahim̐ ||
लागति अवध भयावनि भारी । मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥
घोर जन्तु सम पुर नर नारी । डरपहिं एकहि एक निहारी ॥
lāgati avadha bhayāvani bhārī | mānahum̐ kālarāti am̐dhiārī ||
ghora jantu sama pura nara nārī | ḍarapahiṃ ekahi eka nihārī ||
घर मसान परिजन जनु भूता । सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं । सरित सरोवर देखि न जाहीँ ॥
ghara masāna parijana janu bhūtā | suta hita mīta manahum̐ jamadūtā ||
bāganha biṭapa beli kumhilāhīṃ | sarita sarovara dekhi na jāhīm̐ ||
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर ।
पिक रथांग सुक सारिका, सारस हंस चकोर ॥
haya gaya koṭinha kelimṛga purapasu cātaka mora |
pika rathāṃga suka sārikā, sārasa haṃsa cakora ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0