अयोध्याकाण्ड

अध्याय 75: सुमित्रा की सीख और आशीर्वाद

6 श्लोक · 75 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सुमित्रा की सीख और आशीर्वाद

सुमित्रा कहती हैं, जगत में वही युवती पुत्रवती है जिसका पुत्र रघुपति का भक्त हो, नहीं तो राम से विमुख पुत्र जनने से बाँझ रहना भला। राम तुम्हारे ही भाग्य से वन जा रहे हैं। सब पुण्यों का बड़ा फल यही है कि राम और सीता के चरणों में सहज स्नेह हो। राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह के वश सपने में भी मत होना। सब विकार छोड़कर मन, कर्म, वचन से सेवा करना। बेटा, वही करना जिससे राम को वन में क्लेश न हो। फिर आशीर्वाद दिया कि सीता और रघुवीर के चरणों में निर्मल प्रेम नित नया हो। माता के चरणों में सिर नवाकर लक्ष्मण तुरन्त चले, मानो भाग्य से हिरन कठिन फन्दा तोड़कर भागा हो।

75.1

पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगत जासु सुत होई ॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी । राम बिमुख सुत तेँ हित जानी ॥

putravatī jubatī jaga soī | raghupati bhagata jāsu suta hoī ||
nataru bām̐jha bhali bādi biānī | rāma bimukha suta tem̐ hita jānī ||

75.2

तुम्हरेहिं भाग राम बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीँ ॥
सकल सुकृत कर बड़ फल एहू । राम-सीय-पद, सहज सनेहू ॥

tumharehiṃ bhāga rāma bana jāhīṃ | dūsara hetu tāta kachu nāhīm̐ ||
sakala sukṛta kara bar̤a phala ehū | rāma-sīya-pada, sahaja sanehū ||

75.3

राग रोष इरिषा मद मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥

rāga roṣa iriṣā mada mohū | jani sapanehum̐ inha ke basa hohū ||
sakala prakāra bikāra bihāī | mana krama bacana karehu sevakāī ||

75.4

तुम्ह कहँ बन सब भाँति सुपासू । सङ्ग पितु मातु राम-सिय जासू ॥
जेहिं न राम बन लहहिं कलेसू । सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू ॥

tumha kaham̐ bana saba bhām̐ti supāsū | saṅga pitu mātu rāma-siya jāsū ||
jehiṃ na rāma bana lahahiṃ kalesū | suta soi karehu ihai upadesū ||

75.छं॰ 1छन्द

उपदेस यह जेहिं तात तुम्हरे, राम-सिय सुख पावहीं ।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख, सुरति बन बिसरावहीं ॥
तुलसी सुतहि सिख देइ आयसु, दीन्ह पुनि आसिष दई ।
रति होउ, अबिरल अमल सिय-रघुबीर-पद नित नित नई ॥

upadesa yaha jehiṃ tāta tumhare, rāma-siya sukha pāvahīṃ |
pitu mātu priya parivāra pura sukha, surati bana bisarāvahīṃ ||
tulasī sutahi sikha dei āyasu, dīnha puni āsiṣa daī |
rati hou, abirala amala siya-raghubīra-pada nita nita naī ||

75.सो॰ 75सोरठा

मातु चरन सिर नाइ, चले तुरत सङ्कित हृदयँ ।
बागुर विषम तोराइ, मनहुँ भाग मृग भाग-बस ॥

mātu carana sira nāi, cale turata saṅkita hṛdayam̐ |
bāgura viṣama torāi, manahum̐ bhāga mṛga bhāga-basa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0