अयोध्याकाण्ड

अध्याय 68: श्रीराम की स्वीकृति, कौसल्या की विदाई

5 श्लोक · 68 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम की स्वीकृति, कौसल्या की विदाई

ऐसा कहकर सीता अत्यन्त व्याकुल हो गईं, वियोग के वचन भी न सँभाल सकीं। उनकी दशा देखकर श्रीराम ने मन में जाना कि हठपूर्वक रखने से वे प्राण नहीं रखेंगी। तब सूर्यकुल के कृपालु स्वामी बोले, सोच छोड़कर वन साथ चलो, आज विषाद का अवसर नहीं, शीघ्र वन जाने की तैयारी करो। प्रिय वचन कहकर प्रिया को समझाया, फिर माता के चरण छुए और आशीर्वाद पाया। माता बोलीं, शीघ्र आकर प्रजा का दुःख मिटाना, इस निठुर माता को भूल न जाना। हे विधाता, क्या मेरी दशा फिर लौटेगी कि इस मनोहर जोड़ी को आँखों से देखूँगी? बेटा, वह शुभ दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी माता जीते जी तुम्हारा चन्द्रमुख देखेगी, और फिर बच्चा, लाल, रघुपति, रघुवर कहकर कब बुलाकर हृदय से लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हें निहारूँगी।

68.1

अस कहि सीय बिकल भइ भारी । बचन बियोग न सकी सँभारी ॥
देखि दसा रघुपति जियँ जाना । हठि राखें नहिँ राखिहि प्राना ॥

asa kahi sīya bikala bhai bhārī | bacana biyoga na sakī sam̐bhārī ||
dekhi dasā raghupati jiyam̐ jānā | haṭhi rākheṃ nahim̐ rākhihi prānā ||

68.2

कहेउ कृपाल भानुकुल नाथा । परिहरि सोच चलहु बन साथा ॥
नहिँ बिषाद कर अवसर आजू । बेगि करहु बन-गवन समाजू ॥

kaheu kṛpāla bhānukula nāthā | parihari soca calahu bana sāthā ||
nahim̐ biṣāda kara avasara ājū | begi karahu bana-gavana samājū ||

68.3

कहि प्रिय-बचन प्रिया समुझाई । लगे मातु-पद आसिष पाई ॥
बेगि प्रजा-दुख मेटब आई । जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥

kahi priya-bacana priyā samujhāī | lage mātu-pada āsiṣa pāī ||
begi prajā-dukha meṭaba āī | jananī niṭhura bisari jani jāī ||

68.4

फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी । देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥
सुदिन सुघरी तात का होइहि । जननी जिअत बदन-बिधु जोइहि ॥

phirahi dasā bidhi bahuri ki morī | dekhihaum̐ nayana manohara jorī ||
sudina sugharī tāta kā hoihi | jananī jiata badana-bidhu joihi ||

दो॰ 68दोहा

बहुरि बच्छ कहि लाल कहि, रघुपति रघुबर तात ।
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ, हरषि निरखिहउँ गात ॥

bahuri baccha kahi lāla kahi, raghupati raghubara tāta |
kabahiṃ bolāi lagāi hiyam̐, haraṣi nirakhihaum̐ gāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0