अयोध्याकाण्ड

अध्याय 67: मार्ग में सेवा का सीता का संकल्प

5 श्लोक · 67 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

मार्ग में सेवा का सीता का संकल्प

सीता कहती हैं, मार्ग चलते मुझे थकान नहीं होगी, क्योंकि क्षण क्षण आपके चरणकमल देखती रहूँगी। हर प्रकार से प्रियतम की सेवा करूँगी और मार्ग की सारी थकावट हर लूँगी। पैर धोकर, पेड़ की छाया में बैठकर प्रसन्न मन से पंखा झलूँगी। पसीने की बूँदों से भरा श्याम शरीर देखते हुए प्राणपति के रहते दुःख का समय कहाँ? समतल धरती पर पत्ते बिछाकर यह दासी रात भर पैर दबाएगी। प्रभु के साथ रहते मेरी ओर कौन आँख उठाएगा, जैसे सिंहनी की ओर खरगोश या सियार नहीं देख सकते। क्या मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य? आपके लिए तप उचित और मेरे लिए भोग? ऐसे कठोर वचन सुनकर भी यदि हृदय नहीं फटा, तो यह पामर प्राण वियोग का कठिन दुःख सहेंगे।

67.1

मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन-सरोज निहारी ॥
सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं । मारग-जनित सकल श्रम हरिहौं ॥

mohi maga calata na hoihi hārī | chinu chinu carana-saroja nihārī ||
sabahi bhām̐ti piya sevā karihauṃ | māraga-janita sakala śrama harihauṃ ||

67.2

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं । करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥
श्रम कन सहित स्याम-तनु देखें । कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें ॥

pāya pakhāri baiṭhi taru chāhīṃ | karihaum̐ bāu mudita mana māhīṃ ||
śrama kana sahita syāma-tanu dekheṃ | kaham̐ dukha samau prānapati pekheṃ ||

67.3

सम महि तन तरु पल्लव डासी । पाय पलोटिहि सब निसि दासी ॥
बार बार मृदु मूरति जोही । लागिहि तात बयारि न मोही ॥

sama mahi tana taru pallava ḍāsī | pāya paloṭihi saba nisi dāsī ||
bāra bāra mṛdu mūrati johī | lāgihi tāta bayāri na mohī ||

67.4

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा । सिंघ बधुहि जिमि ससक सिआरा ॥
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहिं उचित तप मो कहँ भोगू ॥

ko prabhu sam̐ga mohi citavanihārā | siṃgha badhuhi jimi sasaka siārā ||
maiṃ sukumāri nātha bana jogū | tumhahiṃ ucita tapa mo kaham̐ bhogū ||

दो॰ 67दोहा

ऐसेउ बचन कठोर सुनि, जौँ न ह्रदउ विलगान ।
तो प्रभु विषम बियोग दुख, सहिहहिं पावँर प्रान ॥

aiseu bacana kaṭhora suni, jaum̐ na hradau vilagāna |
to prabhu viṣama biyoga dukha, sahihahiṃ pāvam̐ra prāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0