सीता कहती हैं, मार्ग चलते मुझे थकान नहीं होगी, क्योंकि क्षण क्षण आपके चरणकमल देखती रहूँगी। हर प्रकार से प्रियतम की सेवा करूँगी और मार्ग की सारी थकावट हर लूँगी। पैर धोकर, पेड़ की छाया में बैठकर प्रसन्न मन से पंखा झलूँगी। पसीने की बूँदों से भरा श्याम शरीर देखते हुए प्राणपति के रहते दुःख का समय कहाँ? समतल धरती पर पत्ते बिछाकर यह दासी रात भर पैर दबाएगी। प्रभु के साथ रहते मेरी ओर कौन आँख उठाएगा, जैसे सिंहनी की ओर खरगोश या सियार नहीं देख सकते। क्या मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य? आपके लिए तप उचित और मेरे लिए भोग? ऐसे कठोर वचन सुनकर भी यदि हृदय नहीं फटा, तो यह पामर प्राण वियोग का कठिन दुःख सहेंगे।