अयोध्याकाण्ड

अध्याय 64: सीता का उत्तर: पति वियोग सबसे बड़ा दुःख

5 श्लोक · 64 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सीता का उत्तर: पति वियोग सबसे बड़ा दुःख

प्रियतम के कोमल और मनोहर वचन सुनकर सीता के सुन्दर नेत्र जल से भर गए। वह शीतल सीख उन्हें ऐसे जलाने लगी जैसे शरद की चाँदनी रात चकवी को जलाती है। व्याकुल वैदेही को उत्तर नहीं सूझता कि पवित्र और स्नेही स्वामी उन्हें छोड़ना चाहते हैं। बरबस आँसू रोककर, हृदय में धीरज धरकर धरती की पुत्री ने सास के पैर छुए और हाथ जोड़कर कहा, देवि, मेरी बड़ी ढिठाई क्षमा कीजिए। प्राणपति ने मुझे वही सीख दी है जिसमें मेरा परम हित हो, पर मैंने मन में विचारकर देखा कि संसार में पति वियोग के समान कोई दुःख नहीं। हे प्राणनाथ, करुणा के धाम, सुन्दर, सुखदायक और सुजान, रघुकुल रूपी कुमुद के चन्द्रमा, आपके बिना स्वर्ग भी नरक के समान है।

64.1

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के । लोचन ललित भरे जल सिय के ॥
सीतल-सिख दाहक भइ कैसे । चकइहि सरद-चन्द-निसि जैसे ॥

suni mṛdu bacana manohara piya ke | locana lalita bhare jala siya ke ||
sītala-sikha dāhaka bhai kaise | cakaihi sarada-canda-nisi jaise ||

64.2

उत्तर न आव बिकल बैदेही । तजन चहत सुचि स्वामि सनेही ॥
बरबस रोकि बिलोचन बारी । धरि धीरज उर अवनिकुमारी ॥

uttara na āva bikala baidehī | tajana cahata suci svāmi sanehī ||
barabasa roki bilocana bārī | dhari dhīraja ura avanikumārī ||

64.3

लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥

lāgi sāsu paga kaha kara jorī | chamabi debi bar̤i abinaya morī ||
dīnhi prānapati mohi sikha soī | jehi bidhi mora parama hita hoī ||

64.4

मैं पुनि समुझि दीख मन माहीं । पिय बियोग सम दुख जग नाहीं ॥

maiṃ puni samujhi dīkha mana māhīṃ | piya biyoga sama dukha jaga nāhīṃ ||

दो॰ 64दोहा

प्राननाथ करुनायतन, सुन्दर सुखद सुजान ।
तुम्ह बिनु रघुकुल-कुमुद बिधु, सुरपुर-नरक समान ॥

prānanātha karunāyatana, sundara sukhada sujāna |
tumha binu raghukula-kumuda bidhu, surapura-naraka samāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0