नर-अहार रजनीचर चरहीं । कपट-बेष बिधि कोटिक करहीं ॥
लागइ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिँ जाइ बखानी ॥
nara-ahāra rajanīcara carahīṃ | kapaṭa-beṣa bidhi koṭika karahīṃ ||
lāgai ati pahāra kara pānī | bipina bipati nahim̐ jāi bakhānī ||
5 श्लोक · 63 में से 326
श्रीराम कहते हैं, वहाँ मनुष्यों को खाने वाले राक्षस घूमते हैं, जो करोड़ों प्रकार के कपट वेष बनाते हैं। पहाड़ का पानी बहुत लगता है। भयानक सर्प, डरावने पक्षी और स्त्री पुरुषों को चुराने वाले राक्षसों के झुंड वहाँ रहते हैं। घने वन की याद आने पर धीर पुरुष भी डर जाते हैं, और हे मृगनयनी, तुम तो स्वभाव से भीरु हो। हंस की चाल वाली तुम यदि वन जाओगी तो लोग मुझे अपयश देंगे। मानसरोवर के अमृत जैसे जल में पली हंसिनी क्या खारे समुद्र में जी सकती है? हे चन्द्रमुखी, यह विचारकर घर रहो, वन में भारी दुःख है। जो स्वाभाविक हितैषी, गुरु और स्वामी की सीख सिर नहीं धरता, वह पछताता है और उसका अहित अवश्य होता है।
नर-अहार रजनीचर चरहीं । कपट-बेष बिधि कोटिक करहीं ॥
लागइ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिँ जाइ बखानी ॥
nara-ahāra rajanīcara carahīṃ | kapaṭa-beṣa bidhi koṭika karahīṃ ||
lāgai ati pahāra kara pānī | bipina bipati nahim̐ jāi bakhānī ||
व्याल-कराल बिहँग बन घोरा । निसिचर-निकर नारि-नर-चोरा ॥
डरपहिं धीर गहन सुधि आये । मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाये ॥
vyāla-karāla biham̐ga bana ghorā | nisicara-nikara nāri-nara-corā ||
ḍarapahiṃ dhīra gahana sudhi āye | mṛgalocani tumha bhīru subhāye ||
हंस-गवनि तुम्ह कानन जोगू । सुनि अपजस मोहि देइहि लोगू ॥
मानस-सलिल-सुधाँ प्रतिपाली । जिअइ कि लवन-पयोधि मराली ॥
haṃsa-gavani tumha kānana jogū | suni apajasa mohi deihi logū ||
mānasa-salila-sudhām̐ pratipālī | jiai ki lavana-payodhi marālī ||
नव-रसाल-बन बिहरनसीला । सोह कि कोकिल-बिपिन करीला ॥
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी । चन्द-बदनि दुख कानन भारी ॥
nava-rasāla-bana biharanasīlā | soha ki kokila-bipina karīlā ||
rahahu bhavana asa hṛdayam̐ bicārī | canda-badani dukha kānana bhārī ||
सहज सुहृद-गुरु-स्वामि सिख, जो न करइ सिर मानि ।
सो पछिताइ अघाइ उर, अवसि होइ हित-हानि ॥
sahaja suhṛda-guru-svāmi sikha, jo na karai sira māni |
so pachitāi aghāi ura, avasi hoi hita-hāni ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0