अयोध्याकाण्ड

अध्याय 57: माता का विलाप, सीता का आगमन

5 श्लोक · 57 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

माता का विलाप, सीता का आगमन

कौसल्या कहती हैं, हे स्वामी, सब देवता और पितर तुम्हारी ऐसे रक्षा करें जैसे पलकें आँखों की। चौदह वर्ष की अवधि जल है और प्रिय परिजन मछलियाँ; तुम करुणा के सागर और धर्म के धुरन्धर हो, ऐसा उपाय करना कि सबके जीते जी आकर मिलो। बलिहारी, नगर, परिजन और गाँवों को अनाथ करके सुख से वन जाओ। आज सबके पुण्यों का फल समाप्त हो गया, कराल काल उलटा हो गया। बहुत प्रकार से विलाप करके वे चरणों से लिपट गईं और स्वयं को परम अभागिनी मानने लगीं। श्रीराम ने माता को उठाकर हृदय से लगाया और कोमल वचन कहकर फिर समझाया। उसी समय समाचार सुनकर सीता व्याकुल होकर उठीं, सास के दोनों चरणकमलों की वन्दना की और सिर झुकाकर बैठ गईं।

57.1

देव पितर सब तुन्हहि गोसाँई । राखहुँ पलक नयन की नाँई ॥
अवधि अम्बु प्रिय परिजन मीना । तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना ॥

deva pitara saba tunhahi gosām̐ī | rākhahum̐ palaka nayana kī nām̐ī ||
avadhi ambu priya parijana mīnā | tumha karunākara dharama dhurīnā ||

57.2

अस बिचारि सोइ करहु उपाई । सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई ॥
जाहु सुखेन बनहिं बलि जाऊँ । करि अनाथ पुर परिजन गाऊँ ॥

asa bicāri soi karahu upāī | sabahi jiata jehiṃ bheṃṭehu āī ||
jāhu sukhena banahiṃ bali jāūm̐ | kari anātha pura parijana gāūm̐ ||

57.3

सब कर आजु सुकृत-फल बीता । भयउ कराल-काल बिपरीता ॥
बहु बिधि बिलपि चरन लपटानी । परम अभागिनि आपुहि जानी ॥

saba kara āju sukṛta-phala bītā | bhayau karāla-kāla biparītā ||
bahu bidhi bilapi carana lapaṭānī | parama abhāgini āpuhi jānī ||

57.4

दारुन दुसह दाह उर ब्यापा । बरनि न जाहिँ बिलाप-कलापा ॥
राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ॥

dāruna dusaha dāha ura byāpā | barani na jāhim̐ bilāpa-kalāpā ||
rāma uṭhāi mātu ura lāī | kahi mṛdu bacana bahuri samujhāī ||

दो॰ 57दोहा

समाचार तेहि समय सुनि, सीय उठी अकुलाइ ।
जाइ सासु पद-कमल जुग, बन्दि बैठि सिर नाइ ॥

samācāra tehi samaya suni, sīya uṭhī akulāi |
jāi sāsu pada-kamala juga, bandi baiṭhi sira nāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0