जौं केवल पितु-आयसु ताता । तो जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तो कानन सत अवध समाना ॥
jauṃ kevala pitu-āyasu tātā | to jani jāhu jāni bar̤i mātā ||
jauṃ pitu mātu kaheu bana jānā | to kānana sata avadha samānā ||
5 श्लोक · 56 में से 326
कौसल्या कहती हैं, यदि केवल पिता की आज्ञा होती तो माता को बड़ी जानकर न जाते। पर यदि पिता और माता दोनों ने वन जाने को कहा है, तो वन तुम्हारे लिए सौ अयोध्याओं के समान है। वन के देवता तुम्हारे पिता, वनदेवियाँ माता हों, और पक्षी तथा पशु तुम्हारे चरणकमलों की सेवा करें। राजा के लिए अन्तिम अवस्था में वनवास उचित ही है, पर तुम्हारी आयु देखकर हृदय में दुःख होता है। वन बड़भागी है और अवध अभागा, जिसे रघुवंश के तिलक ने त्याग दिया। यदि कहूँ कि मुझे साथ ले चलो तो तुम्हारे मन में संशय होगा। तुम प्राणों के प्राण हो, तुम्हारे वन जाने की बात सुनकर मैं बैठी पछताती हूँ। यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर हठ नहीं करती। माता का नाता मानकर मेरी सुधि मत भूलना।
जौं केवल पितु-आयसु ताता । तो जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तो कानन सत अवध समाना ॥
jauṃ kevala pitu-āyasu tātā | to jani jāhu jāni bar̤i mātā ||
jauṃ pitu mātu kaheu bana jānā | to kānana sata avadha samānā ||
पितु-बन देव मातु बन-देवी । खग-मृग चरन-सरोरुह सेवी ॥
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू । बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू ॥
pitu-bana deva mātu bana-devī | khaga-mṛga carana-saroruha sevī ||
aṃtahum̐ ucita nṛpahi banabāsū | baya biloki hiyam̐ hoi harām̐sū ||
बड़भागी बन अवध अभागी । जो रघुबंस तिलक तुम्ह त्यागी ॥
जौँ सुत कहौ सङ्ग मोहि लेहू । तुम्हरे हृदयँ होइ सन्देहू ॥
bar̤abhāgī bana avadha abhāgī | jo raghubaṃsa tilaka tumha tyāgī ||
jaum̐ suta kahau saṅga mohi lehū | tumhare hṛdayam̐ hoi sandehū ||
पूत परम-प्रिय तुम्ह सबही के । प्रान प्रान के जीवन जी के ॥
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । में सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥
pūta parama-priya tumha sabahī ke | prāna prāna ke jīvana jī ke ||
te tumha kahahu mātu bana jāūm̐ | meṃ suni bacana baiṭhi pachitāūm̐ ||
यह बिचारि नहिँ करउँ हठ, झूठ सनेह बढ़ाइ ।
मानि मातु कर नात बलि, सुरति बिसरि जनि जाइ ॥
yaha bicāri nahim̐ karaum̐ haṭha, jhūṭha saneha bar̤hāi |
māni mātu kara nāta bali, surati bisari jani jāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0