बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके ॥
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी ॥
bacana binīta madhura raghubara ke | sara sama lage mātu ura karake ||
sahami sūkhi suni sītali bānī | jimi javāsa pareṃ pāvasa pānī ||
5 श्लोक · 54 में से 326
श्रीराम के विनीत और मधुर वचन माता के हृदय में बाण की तरह चुभ गए। वह शीतल वाणी सुनकर वे सहमकर ऐसे सूख गईं जैसे वर्षा का जल पड़ने पर जवासा। मानो हिरनी ने सिंह की गर्जना सुन ली हो, आँखें भर आईं और शरीर थर थर काँपने लगा। धैर्य धरकर, पुत्र का मुख देखकर माता गद्गद वाणी से बोलीं, बेटा, तुम पिता को प्राणों से प्यारे हो, वे नित्य तुम्हारे चरित देखकर प्रसन्न होते हैं। उन्होंने राज देने के लिए शुभ दिन शोधा था, फिर किस अपराध से वन जाने को कहा? सूर्यवंश को जलाने वाली आग कौन बन गया? राम का रुख देखकर मन्त्री के पुत्र ने कारण समझाकर कहा। प्रसंग सुनकर वे गूँगी सी रह गईं, उनकी दशा वर्णन से परे है।
बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके ॥
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी ॥
bacana binīta madhura raghubara ke | sara sama lage mātu ura karake ||
sahami sūkhi suni sītali bānī | jimi javāsa pareṃ pāvasa pānī ||
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि-नादू ॥
नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी ॥
kahi na jāi kachu hṛdaya biṣādū | manahum̐ mṛgī suni kehari-nādū ||
nayana sajala tana thara thara kām̐pī | mājahi khāi mīna janu māpī ||
धरि धीरज सुत-बदन निहारी । गदगद-बचन कहति महतारी ॥
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥
dhari dhīraja suta-badana nihārī | gadagada-bacana kahati mahatārī ||
tāta pitahi tumha prānapiāre | dekhi mudita nita carita tumhāre ||
राज देन कहँ सुभ दिन साधा । कहेउ जान बन केहिं अपराधा ॥
तात सुनावहु मोहि निदानू । को दिनकर-कुल भयउ कृसानू ॥
rāja dena kaham̐ subha dina sādhā | kaheu jāna bana kehiṃ aparādhā ||
tāta sunāvahu mohi nidānū | ko dinakara-kula bhayau kṛsānū ||
निरखि रामरुख सचिव-सुत, कारन कहेउ बुझाइ ।
सुनि प्रसङ्ग रहि मूक जिमि, दसा बरनि नहिं जाइ ॥
nirakhi rāmarukha saciva-suta, kārana kaheu bujhāi |
suni prasaṅga rahi mūka jimi, dasā barani nahiṃ jāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0