अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलङ्क कोठि जनि होहू ॥
भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥
asa bicāri ura chār̤ahu kohū | soka kalaṅka koṭhi jani hohū ||
bharatahi avasi dehu jubarājū | kānana kāha rāma kara kājū ||
6 श्लोक · 50 में से 326
वृद्धाएँ आगे कहती हैं, क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक का भंडार मत बनो। भरत को अवश्य युवराज पद दो, पर वन में राम का क्या काम? वे राज्य के भूखे नहीं, धर्म की धुरी धारण करने वाले और विषयों से विरक्त हैं। वे घर छोड़कर गुरु के घर रह लें, राजा से दूसरा वर यह माँग लो। हमारी बात नहीं मानोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। यदि हँसी की हो तो खुलकर बता दो। लोग तुम्हें क्या कहेंगे? उठो, वह उपाय करो जिससे कलंक मिटे, वन जाते राम को लौटा लो, क्योंकि राम बिना अवध वैसा है जैसे सूर्य बिना दिन, प्राण बिना शरीर, चन्द्रमा बिना रात। सीख मधुर और हितकारी थी, पर कुबड़ी मन्थरा की सिखाई कैकेयी ने उस पर कान नहीं दिया।
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलङ्क कोठि जनि होहू ॥
भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥
asa bicāri ura chār̤ahu kohū | soka kalaṅka koṭhi jani hohū ||
bharatahi avasi dehu jubarājū | kānana kāha rāma kara kājū ||
नाहिँ न राम राज के भूखे । धरम-धुरीन, विषय-रस रूखे ॥
गुरु गृह बसहुँ राम तजि गेहू । नृप सन अस बर दूसर लेहू ॥
nāhim̐ na rāma rāja ke bhūkhe | dharama-dhurīna, viṣaya-rasa rūkhe ||
guru gṛha basahum̐ rāma taji gehū | nṛpa sana asa bara dūsara lehū ||
जौँ नहिँ लगिहहु कहें हमारे । नहिँ लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥
जौँ परिहास कीन्हि कछु होई । तो कहि प्रगट जनावहु सोई ॥
jaum̐ nahim̐ lagihahu kaheṃ hamāre | nahim̐ lāgihi kachu hātha tumhāre ||
jaum̐ parihāsa kīnhi kachu hoī | to kahi pragaṭa janāvahu soī ||
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहँ लोगू ॥
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई । जेहि बिधि सोक-कलंक नसाई ॥
rāma sarisa suta kānana jogū | kāha kahihi suni tumha kaham̐ logū ||
uṭhahu begi soi karahu upāī | jehi bidhi soka-kalaṃka nasāī ||
जेहि भाँति सोक कलङ्क जाइ, उपाय करि कुल पालही ।
हठि फेरु रामहिँ जात बन, जनि बात दूसरि चालही ॥
जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चन्द बिनु, जिमि जामिनी ।
तिमि अवध तुलसीदास-प्रभु बिनु, समुझि धौँ जियँ भामिनी ॥
jehi bhām̐ti soka kalaṅka jāi, upāya kari kula pālahī |
haṭhi pheru rāmahim̐ jāta bana, jani bāta dūsari cālahī ||
jimi bhānu binu dinu prāna binu tanu canda binu, jimi jāminī |
timi avadha tulasīdāsa-prabhu binu, samujhi dhaum̐ jiyam̐ bhāminī ||
सखिन्ह सिखावन दीन्ह, सुनत मधुर परिनाम हित ।
तेइँ कछु कान न कीन्ह, कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥
sakhinha sikhāvana dīnha, sunata madhura parināma hita |
teim̐ kachu kāna na kīnha, kuṭila prabodhī kūbarī ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0