कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, असह्य क्रोध से रूखी होकर स्त्रियों को ऐसे देखती है जैसे भूखी बाघिन हिरनियों को। रोग को असाध्य जानकर वे उसे मन्दबुद्धि और अभागी कहती हुई चली गईं। नगर के नर नारी विलाप करते और उस कुचाली को करोड़ों गालियाँ देते हैं। विषम ज्वर से जलते हुए वे लम्बी साँसें लेते हैं कि राम के बिना जीने की क्या आशा? प्रजा ऐसे व्याकुल है जैसे पानी सूखने पर जलचर। इस शोक के बीच श्रीराम माता के पास गए। उनका मुख प्रसन्न था और मन में चौगुना उत्साह, क्योंकि यह चिन्ता मिट गई कि राजा रोक लेंगे। जैसे नया हाथी खूँटे से छूटे, वैसे ही राज्य का बन्धन छूटा जानकर वन जाने की बात से उनका आनन्द बढ़ गया।