अयोध्याकाण्ड

अध्याय 41: श्रीराम की मुस्कान और वन की स्वीकृति

5 श्लोक · 41 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम की मुस्कान और वन की स्वीकृति

कैकेयी निडर बैठी कड़वी वाणी कह रही है, जिसे सुनकर कठोरता भी अकुला उठे। जीभ धनुष है, वचन अनेक बाण हैं, और कोमल राजा मानो निशाना हैं, मानो कठोरता ही शरीर धरकर श्रेष्ठ वीर की तरह धनुर्विद्या सीख रही हो। सारा प्रसंग रघुपति को सुनाकर वह ऐसे बैठी मानो निठुरता देह धरकर बैठी हो। सूर्यकुल के सूर्य, सहज आनन्द के भण्डार श्रीराम मन में मुस्कुराए और सब दोषों से रहित, कोमल और सुन्दर वचन बोले, मानो वाणी के आभूषण हों। माता, सुनो, वही पुत्र बड़भागी है जो पिता-माता के वचनों का अनुरागी है। माता-पिता को सन्तुष्ट करने वाला पुत्र सारे संसार में दुर्लभ है। वन में विशेष रूप से मुनियों से मिलना होगा, इसमें सब प्रकार मेरा हित है। उस पर पिता की आज्ञा है और माता, तुम्हारी सम्मति भी।

41.1

निधरक बैठि कहइ कटु बानी । सुनत कठिनता अति अकुलानी ॥
जीभ कमान बचन सर नाना । मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥

nidharaka baiṭhi kahai kaṭu bānī | sunata kaṭhinatā ati akulānī ||
jībha kamāna bacana sara nānā | manahum̐ mahipa mṛdu laccha samānā ||

41.2

जनु कठोर-पन धरें सरीरू । सिखइ धनुष-विद्या बर बीरू ॥
सब प्रसङ्ग रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥

janu kaṭhora-pana dhareṃ sarīrū | sikhai dhanuṣa-vidyā bara bīrū ||
saba prasaṅga raghupatihi sunāī | baiṭhi manahum̐ tanu dhari niṭhurāī ||

41.3

मन मुसकाइ भानुकुल-भानु । राम सहज आनन्द-निधानू ॥
बोले बचन बिगत सब दूषन । मृदु, मञ्जुल जनु बाग-विभूषन ॥

mana musakāi bhānukula-bhānu | rāma sahaja ānanda-nidhānū ||
bole bacana bigata saba dūṣana | mṛdu, mañjula janu bāga-vibhūṣana ||

41.4

सुनु जननी सोइ सुत बड़-भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥

sunu jananī soi suta bar̤a-bhāgī | jo pitu mātu bacana anurāgī ||
tanaya mātu pitu toṣanihārā | durlabha janani sakala saṃsārā ||

दो॰ 41दोहा

मुनिगन मिलनु बिसेषि बन, सबहि भाँति हित मोर ।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥

munigana milanu biseṣi bana, sabahi bhām̐ti hita mora |
tehi maham̐ pitu āyasu bahuri saṃmata jananī tora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0