अयोध्याकाण्ड

अध्याय 34: कैकेयी का क्रोध, राजा का भूमि पर गिरना

5 श्लोक · 34 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कैकेयी का क्रोध, राजा का भूमि पर गिरना

ऐसा कहकर कुटिल रानी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोध की नदी में बाढ़ आ गई हो। वह पाप के पहाड़ से निकली, क्रोध के जल से भरी है। दोनों वरदान उसके किनारे हैं, कठोर हठ धारा है, कुबड़ी के वचन भँवर हैं। वह राजा रूपी वृक्ष को जड़ से ढहाती हुई विपत्ति के समुद्र की ओर चली। राजा ने समझ लिया कि बात सचमुच सच है, स्त्री के बहाने मृत्यु सिर पर नाच रही है। पैर पकड़कर विनती करके उसे बैठाया: सूर्यकुल के लिए कुल्हाड़ी मत बनो। मेरा सिर माँगो, अभी दे दूँ, पर श्रीराम के विरह से मुझे मत मारो। रोग असाध्य देखकर राजा सिर धुनकर धरती पर गिर पड़े और बड़े आर्त्त वचन कहने लगे, राम राम रघुनाथ।

34.1

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी । मानहुँ रोष-तरङ्गिनि बाढ़ी ॥
पाप-पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध-जल जाइ न जोई ॥

asa kahi kuṭila bhaī uṭhi ṭhār̤hī | mānahum̐ roṣa-taraṅgini bār̤hī ||
pāpa-pahāra pragaṭa bhai soī | bharī krodha-jala jāi na joī ||

34.2

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भँवर कूबरी-बचन-प्रचारा ॥
ढाहत सूप-रूप-तरु मूला । चली बिपति-बारिधि अनुकूला ॥

dou bara kūla kaṭhina haṭha dhārā | bham̐vara kūbarī-bacana-pracārā ||
ḍhāhata sūpa-rūpa-taru mūlā | calī bipati-bāridhi anukūlā ||

34.3

लखी नरेस बात सच साँची । तिय मिस मीच सीस पर नाची ॥
गहि पद विनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर-कुल होसि कुठारी ॥

lakhī naresa bāta saca sām̐cī | tiya misa mīca sīsa para nācī ||
gahi pada vinaya kīnha baiṭhārī | jani dinakara-kula hosi kuṭhārī ||

34.4

माँगु माथ अबहीं देउँ तोही । राम-बिरहँ जनि मारसि मोही ॥
राखु राम कह जेहि तेहि भाँती । नाहिँ त जरिहि जनम भरि छाती ॥

mām̐gu mātha abahīṃ deum̐ tohī | rāma-biraham̐ jani mārasi mohī ||
rākhu rāma kaha jehi tehi bhām̐tī | nāhim̐ ta jarihi janama bhari chātī ||

दो॰ 34दोहा

देखी ब्याधि असाध नृप, परेउ धरनि धुनि माथ ।
कहत परम आरत बचन, राम राम रघुनाथ ॥

dekhī byādhi asādha nṛpa, pareu dharani dhuni mātha |
kahata parama ārata bacana, rāma rāma raghunātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0