अयोध्याकाण्ड

अध्याय 326: भरत का आचरण और अयोध्याकाण्ड की पूर्णता

इति श्रीरामचरितमानसे सकल कलिकलुष विध्वंसने विमल विज्ञान वैराग्य सम्पादनो नाम द्वितीयः सोपानः समाप्तः।

6 श्लोक · 326 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत का आचरण और अयोध्याकाण्ड की पूर्णता

तन पुलकित, हृदय में सिय रघुबीर, जीभ पर नाम जप, आँखों में जल: लक्ष्मण, राम और सीता वन में बसते हैं, और भरत घर में रहकर तप से शरीर कसते हैं। दोनों ओर समझकर सब लोग कहते हैं कि भरत सब प्रकार सराहने योग्य हैं। भरत का आचरण परम पवित्र, मधुर, सुन्दर और मंगलकारी है; वह कलि के कठिन पाप और क्लेश हरता है। सिय राम प्रेम के अमृत से भरे भरत जन्म न लेते, तो तुलसी जैसे शठों को हठपूर्वक राम के सम्मुख कौन करता? अन्त में फलश्रुति है: जो नियम से भरत चरित आदर से सुनेंगे, उन्हें सिय राम के चरणों में प्रेम और संसार से वैराग्य अवश्य होगा। यहाँ दूसरा सोपान पूर्ण होता है।

326.1

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू । जीह नाम जप लोचन-नीरू ॥
लखन राम सिय कानन बसहीं । भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ॥

pulaka gāta hiyam̐ siya raghubīrū | jīha nāma japa locana-nīrū ||
lakhana rāma siya kānana basahīṃ | bharatu bhavana basi tapa tanu kasahīṃ ||

326.2

दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू । सब विधि भरत सराहन जोगू ॥
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीँ । देखि दसा मुनिराज लजाहीं ॥

dou disi samujhi kahata sabu logū | saba vidhi bharata sarāhana jogū ||
suni brata nema sādhu sakucāhīm̐ | dekhi dasā munirāja lajāhīṃ ||

326.3

परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मज्जु मुद मङ्गल करनू ॥
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू । महा-माह-निसि दलन दिनेसू ॥

parama punīta bharata ācaranū | madhura majju muda maṅgala karanū ||
harana kaṭhina kali kaluṣa kalesū | mahā-māha-nisi dalana dinesū ||

326.4

पाप पुञ्ज कुञ्जर मृगराजू । समन सकल सन्ताप समाजू ॥
जन-रञ्जन भञ्जन भव-भारू । राम सनेह सुधाकर सारू ॥

pāpa puñja kuñjara mṛgarājū | samana sakala santāpa samājū ||
jana-rañjana bhañjana bhava-bhārū | rāma saneha sudhākara sārū ||

326.छं॰ 1छन्द

सिय राम प्रेम पियूष पूरन, होत जनम न भरत को ।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम, बिषम ब्रत आचरत को ॥
दुख दाह दारिद दम्भ दूषन, सुजस मिस अपहरत को ।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि, राम सनमुख करत को ॥

siya rāma prema piyūṣa pūrana, hota janama na bharata ko |
muni mana agama jama niyama sama dama, biṣama brata ācarata ko ||
dukha dāha dārida dambha dūṣana, sujasa misa apaharata ko |
kalikāla tulasī se saṭhanhi haṭhi, rāma sanamukha karata ko ||

326.सो॰ 326सोरठा

भरत चरित करि नेम, तुलसी जे सादर सुनहिँ ।
सीय-राम-पद पेमु, अवसि होइ भव-रस बिरति ॥

bharata carita kari nema, tulasī je sādara sunahim̐ |
sīya-rāma-pada pemu, avasi hoi bhava-rasa birati ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0