अरण्यकाण्ड

अध्याय 1: इन्द्रपुत्र जयन्त श्रीराम की परीक्षा लेता है

8 श्लोक · 1 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

इन्द्रपुत्र जयन्त श्रीराम की परीक्षा लेता है

काण्ड दो संस्कृत श्लोकों से खुलता है। पहला श्लोक शंकर को धर्मरूपी वृक्ष का मूल और राजा राम का प्रिय कहकर प्रणाम करता है, दूसरा वन-पथ पर चलते श्रीराम का ध्यान है: मेघ-सा श्याम शरीर, पीताम्बर, जटाजूट, हाथ में धनुष-बाण, साथ में सीता और लक्ष्मण। फिर शिवजी उमा से कहते हैं कि राम के गुण ज्ञानियों को वैराग्य देते हैं और हरि से विमुखों को मोह। पुरवासियों और भरत का प्रेम गाकर तुलसीदास अब वन के चरित आरम्भ करते हैं। एक दिन श्रीराम अपने हाथों फूलों के आभूषण बनाकर स्फटिक-शिला पर सीता को पहनाते हैं। इन्द्र का पुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर राम का बल देखना चाहता है, सीता के चरण में चोंच मारकर भागता है। रक्त बहता देख श्रीराम सींक को धनुष पर चढ़ाते हैं।

1.श्लो॰ 1

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं ।
वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम् ॥
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं ।
वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ॥

mūlaṃ dharmatarorvivekajaladheḥ pūrṇendumānandadaṃ |
vairāgyāmbujabhāskaraṃ hyaghaghanadhvāntāpahaṃ tāpaham ||
mohāmbhodharapūgapāṭanavidhau svaḥsambhavaṃ śaṅkaraṃ |
vande brahmakulaṃ kalaṃkaśamanaṃ śrīrāmabhūpapriyam ||

1.श्लो॰ 2

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं ।
पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् ॥
राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं ।
सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥

sāndrānandapayodasaubhagatanuṃ pītāmbaraṃ sundaraṃ |
pāṇau bāṇaśarāsanaṃ kaṭilasattūṇīrabhāraṃ varam ||
rājīvāyatalocanaṃ dhṛtajaṭājūṭena saṃśobhitaṃ |
sītālakṣmaṇasaṃyutaṃ pathigataṃ rāmābhirāmaṃ bhaje ||

1.सो॰ 1सोरठा

उमा राम-गुन-गूढ़, पंडित मुनि पावहिँ बिरति ।
पावहिँ मोह बिमूढ़, जे हरि-विमुख न धरम-रति ॥

umā rāma-guna-gūr̤ha, paṃḍita muni pāvahim̐ birati |
pāvahim̐ moha bimūr̤ha, je hari-vimukha na dharama-rati ||

1.1

पुर-नर-भरत-प्रीति मैं गाई । मति अनुरूप अनूप सुहाई ॥
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन । करत जे बन सुर-नर-मुनि भावन ॥

pura-nara-bharata-prīti maiṃ gāī | mati anurūpa anūpa suhāī ||
aba prabhu carita sunahu ati pāvana | karata je bana sura-nara-muni bhāvana ||

1.2

एक बार चुनि कुसुम सुहाये । निज कर भूषन राम बनाये ॥
सीतहि पहिराये मनु सादर । बैठे फटिक-सिला पर सुन्दर ॥

eka bāra cuni kusuma suhāye | nija kara bhūṣana rāma banāye ||
sītahi pahirāye manu sādara | baiṭhe phaṭika-silā para sundara ||

1.3

सुरपति-सुत धरि बायस बेखा । सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा । महा-मन्द-मति पावन चाहा ॥

surapati-suta dhari bāyasa bekhā | saṭha cāhata raghupati bala dekhā ||
jimi pipīlikā sāgara thāhā | mahā-manda-mati pāvana cāhā ||

1.4

सीता परत चौंच हति भागा । मूढ़ मन्दमति-कारन कागा ॥
चला रुधिर रघुनायक जाना । सींक धनुष सायक सन्धाना ॥

sītā parata cauṃca hati bhāgā | mūr̤ha mandamati-kārana kāgā ||
calā rudhira raghunāyaka jānā | sīṃka dhanuṣa sāyaka sandhānā ||

दो॰ 1दोहा

अति कृपाल रघुनायक, सदा दीन पर नेह ।
ता सन आइ कीन्ह छल, मूरख अवगुन-गेह ॥

ati kṛpāla raghunāyaka, sadā dīna para neha |
tā sana āi kīnha chala, mūrakha avaguna-geha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0