अयोध्याकाण्ड

अध्याय 322: अवध वापसी और जनक का प्रस्थान

5 श्लोक · 322 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

अवध वापसी और जनक का प्रस्थान

मुनि, ब्राह्मण, गुरु, भरत और राजा जनक, सारा समाज राम विरह में बेहाल है; सब चुपचाप मार्ग पर चले जा रहे हैं। यमुना पार करके सब उस पार हुए, और वह दिन बिना भोजन के बीता। गंगा पार करके दूसरा पड़ाव हुआ, जहाँ राम के सखा निषाद ने सब सुविधा की। सई पार करके गोमती में स्नान किया और चौथे दिन अवधपुर पहुँचे। जनक चार दिन नगर में रहे, और मन्त्रियों, गुरु और भरत को राज्य सौंपकर सब साज सजाकर तिरहुत चले गए। नगर के नर नारी गुरु की सीख मानकर राम की राजधानी में सुख से बस गए। राम दर्शन के लिये सब लोग नियम और उपवास करते हैं, भूषण, भोग और सुख छोड़कर अवधि की आशा पर जी रहे हैं।

322.1

मुनि महिसुर गुरु भरत भुआलू । राम-बिरहँ सम साज बिहालू ॥
प्रभु गुन-ग्राम गनत मन माहीं । सब चुपचाप चले मग जाहीं ॥

muni mahisura guru bharata bhuālū | rāma-biraham̐ sama sāja bihālū ||
prabhu guna-grāma ganata mana māhīṃ | saba cupacāpa cale maga jāhīṃ ||

322.2

जमुना उतरि पार सब भयऊ । सो बासर बिनु भोजन गयऊ ॥
उतरि देवसरि दूसर बासू । राम-सखा सब कीन्ह सुपासू ॥

jamunā utari pāra saba bhayaū | so bāsara binu bhojana gayaū ||
utari devasari dūsara bāsū | rāma-sakhā saba kīnha supāsū ||

322.3

सई उतरि गोमतीं नहाये । चौथें दिवस अवधपुर आये ॥
जनक रहे पुर बासर बारी । राज काज सब साज संभारी ॥

saī utari gomatīṃ nahāye | cautheṃ divasa avadhapura āye ||
janaka rahe pura bāsara bārī | rāja kāja saba sāja saṃbhārī ||

322.4

सौंपि सचिव गुरु भरतहि राजू । तेरहुति चले साजि सबु साजू ॥
नगर नारि नर गुरु सिख मानी । बसे सुखेन राम-रजधानी ॥

sauṃpi saciva guru bharatahi rājū | terahuti cale sāji sabu sājū ||
nagara nāri nara guru sikha mānī | base sukhena rāma-rajadhānī ||

दो॰ 322दोहा

राम दरस लगि लोग सब, करत नेम उपवास ।
तजि तजि भूषन भोग सुख, जियत अवधि कीं आस ॥

rāma darasa lagi loga saba, karata nema upavāsa |
taji taji bhūṣana bhoga sukha, jiyata avadhi kīṃ āsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0