सीता परिजनों और माता पिता से मिलकर लौटीं, जिनका प्रेम मान से भी प्रिय और पवित्र है। प्रणाम करके उन्होंने सब सासों से भेंट की; उस प्रीति को कहने में कवि के हृदय में उत्साह नहीं। सीख सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीता दोनों कुलों की प्रीति में समाई रहीं। रघुपति ने सुन्दर पालकियाँ मँगवाईं और समझा बुझाकर सब माताओं को चढ़ाया। घोड़े, हाथी और अनेक वाहन सजाकर भरत की सेना चल पड़ी। हृदय में सीता लक्ष्मण सहित राम को रखे सब लोग अचेत से चले जा रहे हैं। पशु भी मन मारे चल रहे हैं। गुरु और गुरुपत्नी के चरणों की वन्दना करके प्रभु सीता और लक्ष्मण सहित हर्ष और विषाद के साथ पर्णकुटी लौट आए।