अयोध्याकाण्ड

अध्याय 318: भरत और शत्रुघ्न विदा लेते हैं

5 श्लोक · 318 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत और शत्रुघ्न विदा लेते हैं

जहाँ जनक और गुरु की बुद्धि भी भोली हो गई, वहाँ इसे साधारण प्रीति कहना बड़ा दोष है। तुलसीदास कहते हैं, रघुबर और भरत का वियोग वर्णन करूँ तो लोग कवि को कठोर हृदय जानेंगे। वह संकोच का रस अकथनीय है; समय और स्नेह को स्मरण करके वाणी सकुचा गई। भरत से मिलकर रघुबर ने उन्हें समझाया, फिर शत्रुघ्न को हर्ष से हृदय लगाया। कठोर दुःख के साथ दोनों समाज चलने की तैयारी करने लगे। प्रभु के चरणकमलों की वन्दना करके दोनों भाई राम की आज्ञा सिर पर धरकर चले। लक्ष्मण से मिलकर, प्रणाम करके और सीता की चरणधूलि सिर पर धरकर, सब मंगलों की मूल आशीष सुनकर वे प्रेम सहित चले।

318.1

जहाँ जनक गुरु मति भोरी । प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥
बरनत रघुबर भरत बियोगू । सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ॥

jahām̐ janaka guru mati bhorī | prākṛta prīti kahata bar̤i khorī ||
baranata raghubara bharata biyogū | suni kaṭhora kabi jānihi logū ||

318.2

सो सकोच-रस अकथ सुबानी । समउ सनेह सुमिरि सकुचानी ॥
भेंटि भरत रघुबर समुझाये । पुनि रिपुदवन हरषि हियँ लाये ॥

so sakoca-rasa akatha subānī | samau saneha sumiri sakucānī ||
bheṃṭi bharata raghubara samujhāye | puni ripudavana haraṣi hiyam̐ lāye ||

318.3

सेवक सचिव भरत रूख पाई । निज निज काज लगे सब जाई ॥
सुनि दारुन दुख दुहूँ समाजा । लगे चलन के साजन साजा ॥

sevaka saciva bharata rūkha pāī | nija nija kāja lage saba jāī ||
suni dāruna dukha duhūm̐ samājā | lage calana ke sājana sājā ||

318.4

मनु-पद-पदुम बन्दि दोउ भाई । चले सीस धरि राम-रजाई ॥
मुनि तापस बनदेव निहोरी । सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥

manu-pada-paduma bandi dou bhāī | cale sīsa dhari rāma-rajāī ||
muni tāpasa banadeva nihorī | saba sanamāni bahori bahorī ||

दो॰ 318दोहा

दो लखनहि भेंटि प्रनाम करि, सिर धरि सिय-पद धूरि ।
चले सप्रेम असीस सुनि, सकल सुमङ्गल-मूरि ॥

do lakhanahi bheṃṭi pranāma kari, sira dhari siya-pada dhūri |
cale saprema asīsa suni, sakala sumaṅgala-mūri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0