अयोध्याकाण्ड

अध्याय 315: मुखिया मुख के समान हो

5 श्लोक · 315 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

मुखिया मुख के समान हो

राम कहते हैं, तात, तुम्हारी, मेरी, परिवार की, घर और धन की चिन्ता गुरु और राजा को है। सिर पर गुरु, मुनि और मिथिलेश हैं, तो हमें तुम्हें सपने में भी क्लेश नहीं। हमारा तुम्हारा परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ यही है कि हम दोनों भाई पिता की आज्ञा का पालन करें; यह लोक और वेद दोनों में भला है। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर जाओ और अवधि भर अवध का पालन करो। तुम मुनि, माताओं और मन्त्रियों की सीख मानकर पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन करना। तुलसी कहते हैं, मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो खाता पीता अकेला है, पर विवेक से सब अंगों का पालन पोषण करता है।

315.1

तात तुम्हारि मोरि परिजन की । चिन्ता गुरहि नृपहि घर धन की ॥
माथे पर गुरु मुनि मिथिलेसू । हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू ॥

tāta tumhāri mori parijana kī | cintā gurahi nṛpahi ghara dhana kī ||
māthe para guru muni mithilesū | hamahi tumhahi sapanehum̐ na kalesū ||

315.2

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु । स्वारथ सुजस धरम परमारथ ॥
पितु-आयसु पालिहिं दुहुँ भाई । लोक बेद भल भूप भलाई ॥

mora tumhāra parama puruṣārathu | svāratha sujasa dharama paramāratha ||
pitu-āyasu pālihiṃ duhum̐ bhāī | loka beda bhala bhūpa bhalāī ||

315.3

गुरु पितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परइ न खालें ॥
अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥

guru pitu mātu svāmi sikha pāleṃ | calehum̐ kumaga paga parai na khāleṃ ||
asa bicāri saba soca bihāī | pālahu avadha avadhi bhari jāī ||

315.4

देस कोस पुरजन परिवारू । गुरु-पद-रजहिं लाग छरुभारू ॥
तुम्ह मुनि-मातु-सचिव सिख मानी । पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ॥

desa kosa purajana parivārū | guru-pada-rajahiṃ lāga charubhārū ||
tumha muni-mātu-saciva sikha mānī | pālehu puhumi prajā rajadhānī ||

दो॰ 315दोहा

मुखिआ मुख सो चाहिऐ, खान पान कह एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक ॥

mukhiā mukha so cāhiai, khāna pāna kaha eka |
pālai poṣai sakala aṃga, tulasī sahita bibeka ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0