पुरजन परिजन प्रजा गोसाँई । सब सुचि सरस सनेहँ सगाई ॥
राउर बदि अल भव-दुख-दाहू । प्रभु बिनु बादि परम-पद लाहू ॥
purajana parijana prajā gosām̐ī | saba suci sarasa saneham̐ sagāī ||
rāura badi ala bhava-dukha-dāhū | prabhu binu bādi parama-pada lāhū ||
5 श्लोक · 314 में से 326
भरत कहते हैं, गोसाईं, पुरजन, परिजन और प्रजा सब आपसे पवित्र और सरस स्नेह के नाते से जुड़े हैं। आपके लिये संसार के दुःख की जलन भी भली है, और प्रभु के बिना परमपद का लाभ भी व्यर्थ। सुजान स्वामी सबकी रुचि, लालसा और रहनी जानते हैं; शरणागत पालक सबका पालन करेंगे और दोनों ओर निभाएँगे। मुझे सब प्रकार ऐसा भारी भरोसा है, विचार करने पर तिनके भर सोच नहीं। मेरी आर्ति और नाथ का स्नेह, दोनों ने मिलकर मुझे हठपूर्वक ढीठ बना दिया। हे स्वामी, यह बड़ा दोष दूर करके, संकोच छोड़कर इस अनुगामी को सीख दीजिए। दीनबन्धु और प्रवीण राम भाई के दीन और छलहीन वचन सुनकर देश, काल और अवसर के अनुकूल बोले।
पुरजन परिजन प्रजा गोसाँई । सब सुचि सरस सनेहँ सगाई ॥
राउर बदि अल भव-दुख-दाहू । प्रभु बिनु बादि परम-पद लाहू ॥
purajana parijana prajā gosām̐ī | saba suci sarasa saneham̐ sagāī ||
rāura badi ala bhava-dukha-dāhū | prabhu binu bādi parama-pada lāhū ||
स्वामि सुजान जानि सब ही की । रुचि लालसा रहनि जन जी की ॥
प्रनतपालु पालिहि सब काहू । देउ दुहूँ दिसि ओर निबाहू ॥
svāmi sujāna jāni saba hī kī | ruci lālasā rahani jana jī kī ||
pranatapālu pālihi saba kāhū | deu duhūm̐ disi ora nibāhū ||
अस मोहि सब विधि भूरि भरोसो । किये बिचार न सोच खरो से ॥
आरति भार नाथ कर छोहू । दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू ॥
asa mohi saba vidhi bhūri bharoso | kiye bicāra na soca kharo se ||
ārati bhāra nātha kara chohū | duhum̐ mili kīnha ḍhīṭhu haṭhi mohū ||
यह बड़ दोष दूरि करि स्वामी । तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ॥
भरत बिनय सुनि सबहिँ प्रसंसी । छोर नीर बिबरन गति हंसी ॥
yaha bar̤a doṣa dūri kari svāmī | taji sakoca sikhaia anugāmī ||
bharata binaya suni sabahim̐ prasaṃsī | chora nīra bibarana gati haṃsī ||
दीनबन्धु सुनि बन्धु के, बचन दीन छलहीन ।
देस काल अवसर सरित, बोले राम प्रबीन ॥
dīnabandhu suni bandhu ke, bacana dīna chalahīna |
desa kāla avasara sarita, bole rāma prabīna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0