राज-धरम-सरबस एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥
बन्धु प्रबोध कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥
rāja-dharama-sarabasa etanoī | jimi mana māham̐ manoratha goī ||
bandhu prabodha kīnha bahu bhām̐tī | binu adhāra mana toṣu na sām̐tī ||
5 श्लोक · 316 में से 326
राम कहते हैं, राजधर्म का सर्वस्व इतना ही है। उन्होंने भाई को बहुत प्रकार समझाया, पर बिना आधार के भरत के मन को सन्तोष और शान्ति नहीं। तब रघुराज ने कृपा करके अपनी पादुकाएँ दीं, और भरत ने उन्हें आदर से सिर पर धारण कर लिया। करुणानिधान की ये पादुकाएँ मानो प्रजा के प्राणों के दो पहरेदार हैं, भरत के प्रेम रूपी रत्न का सम्पुट हैं, रघुकुल के किवाड़ और सेवा तथा धर्म के निर्मल नेत्र हैं। भरत ऐसे प्रसन्न हुए मानो सहारा मिल गया, जैसे सिय राम के रहने से सुख हो। प्रणाम करके उन्होंने विदा माँगी, राम ने उन्हें हृदय से लगा लिया। कुटिल इन्द्र ने बुरा अवसर पाकर लोगों में उचाट फैला दिया।
राज-धरम-सरबस एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥
बन्धु प्रबोध कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥
rāja-dharama-sarabasa etanoī | jimi mana māham̐ manoratha goī ||
bandhu prabodha kīnha bahu bhām̐tī | binu adhāra mana toṣu na sām̐tī ||
भरत सील गुरु सचिव समाजू । सकुच सनेह बिबस रघुराजू ॥
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीँ । सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ॥
bharata sīla guru saciva samājū | sakuca saneha bibasa raghurājū ||
prabhu kari kṛpā pām̐varīṃ dīnhīm̐ | sādara bharata sīsa dhari līnhīṃ ||
चरनपीठ करुनानिधान के । जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ॥
सम्पुट भरत सनेह-रतन के । आखर जुग जनु जीव जतन के ॥
caranapīṭha karunānidhāna ke | janu juga jāmika prajā prāna ke ||
sampuṭa bharata saneha-ratana ke | ākhara juga janu jīva jatana ke ||
कुल-कपाट कर कुसल करम के । बिमल नयन सेवा सुधरम के ॥
भरत मुदित अवलम्ब लहे से । अस सुख जस सिय-राम रहे तेँ ॥
kula-kapāṭa kara kusala karama ke | bimala nayana sevā sudharama ke ||
bharata mudita avalamba lahe se | asa sukha jasa siya-rāma rahe tem̐ ||
मागेउ बिदा प्रनाम करि, राम लिये उर लाइ ।
लोग उचाटे अमरपति, कुटिल कुअवसर पाइ ॥
māgeu bidā pranāma kari, rāma liye ura lāi |
loga ucāṭe amarapati, kuṭila kuavasara pāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0