अयोध्याकाण्ड

अध्याय 313: भरत अवध की सेवा हेतु आज्ञा माँगते हैं

5 श्लोक · 313 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत अवध की सेवा हेतु आज्ञा माँगते हैं

भोर में नहाकर सारा समाज जुटा: भरत, ब्राह्मण और तिरहुत के राजा। मन में आज का दिन शुभ जानकर भी कृपालु राम कहने में सकुचाते हैं। उन्होंने गुरु, राजा, भरत और सभा की ओर देखा, फिर सकुचाकर धरती की ओर देखने लगे। सारी सभा उनके शील की सराहना करके सोचती है कि राम जैसा संकोची स्वामी कहीं नहीं। सुजान भरत राम का रुख देखकर प्रेम से उठे, विशेष धीरज धरा, दण्डवत करके हाथ जोड़कर बोले, नाथ, आपने मेरी सारी रुचि रख ली। मेरे लिये सबने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकार दुःख पाया। अब गोसाईं, मुझे आज्ञा दीजिए, मैं जाकर अवधि भर अवध की सेवा करूँ। हे दीनदयाल, कृपालु कोसलपाल, जिस उपाय से यह सेवक फिर आपके चरण देखे, अवधि तक के लिये वही सीख दीजिए।

313.1

और न्हाइ सब जुरा समाजू । भरत भूमिसुर तेरहुति राजू ॥
भल दिन आजु जानि मन माहीं । राम कृपाल कहत सकुचाहीं ॥

aura nhāi saba jurā samājū | bharata bhūmisura terahuti rājū ||
bhala dina āju jāni mana māhīṃ | rāma kṛpāla kahata sakucāhīṃ ||

313.2

गुरु नप भरत सभा अवलोकी । सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ॥
सील सराहि सभा सब सोची । कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची ॥

guru napa bharata sabhā avalokī | sakuci rāma phiri avani bilokī ||
sīla sarāhi sabhā saba socī | kahum̐ na rāma sama svāmi sam̐kocī ||

313.3

भरत सुजान राम रुख देखी । उठि सप्रेम धरि धीर बिसेखी ॥
करि दंडवत कहत कर जोरी । राखीं नाथ सकल रुचि भारी ॥

bharata sujāna rāma rukha dekhī | uṭhi saprema dhari dhīra bisekhī ||
kari daṃḍavata kahata kara jorī | rākhīṃ nātha sakala ruci bhārī ||

313.4

मोहि लगि सहेउ सबहिँ सन्तापू । बहुत भाँति दुख पावा आपू ॥
अब गोसाइँ मोहि देहु रजाई । सेवौं अवध अवधि भरि जाई ॥

mohi lagi saheu sabahim̐ santāpū | bahuta bhām̐ti dukha pāvā āpū ||
aba gosāim̐ mohi dehu rajāī | sevauṃ avadha avadhi bhari jāī ||

दो॰ 313दोहा

हो-जेहिं उपाय पुनि पाय जन, देखै दीनदयाल ।
तो सिख देइअ अवधि लगि, कोसलपाल कृपाल ॥

ho-jehiṃ upāya puni pāya jana, dekhai dīnadayāla |
to sikha deia avadhi lagi, kosalapāla kṛpāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0