एक मनोरथ बड़ मन माहीं । सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ॥
कहहु तात प्रभु आयसु पाई । बोले बानि सनेह सुहाई ॥
eka manoratha bar̤a mana māhīṃ | sabhayam̐ sakoca jāta kahi nāhīṃ ||
kahahu tāta prabhu āyasu pāī | bole bāni saneha suhāī ||
5 श्लोक · 308 में से 326
भरत कहते हैं, मन में एक बड़ा मनोरथ है, पर भय और संकोच से कहा नहीं जाता। प्रभु बोले, तात, कहो; आज्ञा पाकर भरत स्नेह भरी सुहावनी वाणी में बोले। चित्रकूट के मुनियों के स्थान, तीर्थ और वन, नदियाँ और पर्वत, और विशेषकर प्रभु के चरणों से अंकित भूमि, आज्ञा हो तो जाकर देख आऊँ। राम ने कहा, अवश्य, पर अत्रि मुनि की आज्ञा सिर पर धरो, और तात, निर्भय होकर वन में विचरो। ऋषिनायक जहाँ आज्ञा दें, वहीं तीर्थों का जल रख देना। प्रभु के वचन सुनकर भरत सुखी हुए और प्रसन्न होकर मुनि के चरणकमलों में सिर नवाया। सब मंगलों के मूल भरत राम संवाद को सुनकर स्वार्थी देवता भी रघुकुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे।
एक मनोरथ बड़ मन माहीं । सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ॥
कहहु तात प्रभु आयसु पाई । बोले बानि सनेह सुहाई ॥
eka manoratha bar̤a mana māhīṃ | sabhayam̐ sakoca jāta kahi nāhīṃ ||
kahahu tāta prabhu āyasu pāī | bole bāni saneha suhāī ||
चित्रकूट मुनि-थल तीरथ बन । खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥
प्रभु-पद अङ्कित अवनि बिसेखी । आयसु होइ त आवउँ देखी ॥
citrakūṭa muni-thala tīratha bana | khaga mṛga sara sari nirjhara girigana ||
prabhu-pada aṅkita avani bisekhī | āyasu hoi ta āvaum̐ dekhī ||
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू । तात बिगत-भय कानन चरहू ॥
मुनि प्रसाद बन मङ्गल-दाता । पावन परम सुहावन भ्राता ॥
avasi atri āyasu sira dharahū | tāta bigata-bhaya kānana carahū ||
muni prasāda bana maṅgala-dātā | pāvana parama suhāvana bhrātā ||
रिषि-नायक जहँ आयसु देहीं । राखेहु तीरथ-जल थल तेहीं ॥
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा । मुनि-पद-कमल मुदित सिर नावा ॥
riṣi-nāyaka jaham̐ āyasu dehīṃ | rākhehu tīratha-jala thala tehīṃ ||
suni prabhu bacana bharata sukha pāvā | muni-pada-kamala mudita sira nāvā ||
भरत-राम-सम्बाद सुनि, सकल सुमङ्गल-मूल ।
सुर स्वारथी सराहि कुल, बरषत सुरतरु फूल ॥
bharata-rāma-sambāda suni, sakala sumaṅgala-mūla |
sura svārathī sarāhi kula, baraṣata surataru phūla ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0