अयोध्याकाण्ड

अध्याय 307: भरत सन्तुष्ट, तीर्थजल के विषय में पूछते हैं

5 श्लोक · 307 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत सन्तुष्ट, तीर्थजल के विषय में पूछते हैं

रघुबर की वाणी सुनकर, जो मानो प्रेम के सागर में अमृत से सनी थी, सारी सभा स्नेह की समाधि में शिथिल हो गई; यह दशा देखकर शारदा ने भी चुप्पी साध ली। भरत को परम सन्तोष हुआ; स्वामी सम्मुख हो गए, और दुःख तथा दोष विमुख। मुख प्रसन्न हुआ, मन का विषाद मिट गया, मानो गूँगे को वाणी का प्रसाद मिल गया। फिर प्रणाम करके बोले, नाथ, मुझे साथ जाने का सुख मिल गया और जगत में जन्म लेने का लाभ। अब कृपालु, जैसी आज्ञा हो, वह मैं आदर से सिर धरकर करूँगा। देव, मुझे वह सहारा दीजिए जिसकी सेवा करके मैं अवधि के पार पहुँचूँ। हे देव, आपके अभिषेक के लिये गुरु की आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थों का जल लाया हूँ; उसके लिये क्या आज्ञा है?

307.1

सभा सकल सुनि रघुबर बानी । प्रेम-पयोधि अमिय जनु सानी ॥
सिथिल समाज सनेह समाधी । देखि दसा चुप सारद साधी ॥

sabhā sakala suni raghubara bānī | prema-payodhi amiya janu sānī ||
sithila samāja saneha samādhī | dekhi dasā cupa sārada sādhī ||

307.2

भरतहि भयउ परम सन्तोषू । सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ॥
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू । भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू ॥

bharatahi bhayau parama santoṣū | sanamukha svāmi bimukha dukha doṣū ||
mukha prasanna mana miṭā biṣādū | bhā janu gūm̐gehi girā prasādū ||

307.3

कीन्ह सप्रेम प्रनाम बहोरी । बोले पानि-पङ्करुह जोरी ॥
नाथ भयउ सुख साथ गये को । लहेउँ लाहु जग जनम भये को ॥

kīnha saprema pranāma bahorī | bole pāni-paṅkaruha jorī ||
nātha bhayau sukha sātha gaye ko | laheum̐ lāhu jaga janama bhaye ko ||

307.4

अब कृपाल जस आयसु होई । करउँ सीस धरि सादर सोई ॥
सो अवलम्ब देव मोहि देई । अवधि पार पावउँ जेहि सेई ॥

aba kṛpāla jasa āyasu hoī | karaum̐ sīsa dhari sādara soī ||
so avalamba deva mohi deī | avadhi pāra pāvaum̐ jehi seī ||

दो॰ 307दोहा

देव देव अभिषेक हित, गुरु अनुसासन पाइ ।
आनेउँ सब तीरथ-सलिल, तेहि कहँ काह रजाइ ॥

deva deva abhiṣeka hita, guru anusāsana pāi |
āneum̐ saba tīratha-salila, tehi kaham̐ kāha rajāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0