अयोध्याकाण्ड

अध्याय 300: भरत क्षमा माँगकर आज्ञा की प्रतीक्षा करते हैं

5 श्लोक · 300 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत क्षमा माँगकर आज्ञा की प्रतीक्षा करते हैं

शोक से, स्नेह से या बाल स्वभाव से, भरत कहते हैं, मैं आपकी आज्ञा को बाएँ करके चला आया। तब भी कृपालु ने अपनी ओर देखकर मेरा सब प्रकार भला ही माना। मैंने मंगल के मूल आपके चरण देखे और जान लिया कि स्वामी सहज ही अनुकूल हैं। गोसाईं ने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रखा। नाथ, मैंने स्वामी और समाज का संकोच छोड़कर निरी ढिठाई की है। विनय या अविनय, जैसी रुचि आई, वैसी वाणी कही; मुझे अत्यन्त आर्त जानकर देव क्षमा करेंगे। सुहृद, सुजान और सुन्दर स्वामी से बहुत कहना बड़ा दोष है; हे देव, अब आज्ञा दीजिए, आपने मेरी सब बात सुधार दी है।

300.1

सोक सनेहँ कि बाल सुभायें । आयउँ लाइ रजायसु बायें ॥
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा । सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥

soka saneham̐ ki bāla subhāyeṃ | āyaum̐ lāi rajāyasu bāyeṃ ||
tabahum̐ kṛpāla heri nija orā | sabahi bhām̐ti bhala māneu morā ||

300.2

देखेउँ पाय सुमङ्गल-मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥

dekheum̐ pāya sumaṅgala-mūlā | jāneum̐ svāmi sahaja anukūlā ||
bar̤eṃ samāja bilokeum̐ bhāgū | bar̤īṃ cūka sāhiba anurāgū ||

300.3

कृपा अनुग्रह अङ्ग अघाई । कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ॥
राखा मोर दुलार गोसाँई । अपनें सील सुभायँ भलाईं ॥

kṛpā anugraha aṅga aghāī | kīnhi kṛpānidhi saba adhikāī ||
rākhā mora dulāra gosām̐ī | apaneṃ sīla subhāyam̐ bhalāīṃ ||

300.4

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई । स्वामि-समाज सकोच बिहाई ॥
अबिनय बिनय जथा रुचि बानी । छमिहि देउ अति आरत जानी ॥

nātha nipaṭa maiṃ kīnhi ḍhiṭhāī | svāmi-samāja sakoca bihāī ||
abinaya binaya jathā ruci bānī | chamihi deu ati ārata jānī ||

दो॰ 300दोहा

सुह्रद सुजान सुसाहिबहि, बहुत कहब बड़ि खोरि ।
आयसु देइअ देव अब, सबइ सुधारी मोरि ॥

suhrada sujāna susāhibahi, bahuta kahaba bar̤i khori |
āyasu deia deva aba, sabai sudhārī mori ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0