अयोध्याकाण्ड

अध्याय 301: भरत की विनती, आज्ञा पालन ही सेवा

6 श्लोक · 301 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत की विनती, आज्ञा पालन ही सेवा

प्रभु के चरणकमलों की रज की दुहाई देकर भरत अपने हृदय की जागते, सोते और सपने की रुचि कहते हैं: स्वार्थ, छल और चारों फल छोड़कर सहज स्नेह से स्वामी की सेवा। आज्ञा पालन के समान अच्छे स्वामी की कोई सेवा नहीं; देव, यही प्रसाद सेवक को मिले। यह कहकर वे प्रेम से विवश हो गए, तन पुलकित, आँखों में जल, और अकुलाकर प्रभु के चरण पकड़ लिये। कृपासिन्धु ने मधुर वाणी से सम्मान करके हाथ पकड़कर उन्हें पास बिठाया। सब भरत के भाईपन और भक्ति को सराहते हैं। देवता भरत की प्रशंसा करते फूल बरसाते हैं, पर मलिन मन से; दोनों समाजों को दुःखी देखकर महामलिन इन्द्र मरे हुओं को मारकर अपना मंगल चाहते हैं।

301.1

प्रभु-पद-पदुम पराग दोहाई । सत्य-सुकृत-सुख-सीवँ सुहाई ॥
सो करि कहउँ हिये अपने की । रुचि जागत सोवत सपने की ॥

prabhu-pada-paduma parāga dohāī | satya-sukṛta-sukha-sīvam̐ suhāī ||
so kari kahaum̐ hiye apane kī | ruci jāgata sovata sapane kī ||

301.2

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥
अज्ञा सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसाद जन पावै देवा ॥

sahaja saneham̐ svāmi sevakāī | svāratha chala phala cāri bihāī ||
ajñā sama na susāhiba sevā | so prasāda jana pāvai devā ||

301.3

अस कहि प्रेम बिबस भये भारी । पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥
प्रभु-पद-कमल गहे अकुलाई । समउ सनेह न सो कहि जाई ॥

asa kahi prema bibasa bhaye bhārī | pulaka sarīra bilocana bārī ||
prabhu-pada-kamala gahe akulāī | samau saneha na so kahi jāī ||

301.4

कृपासिन्धु सनमानि सुबानी । बैठाये समीप गहि पानी ॥
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥

kṛpāsindhu sanamāni subānī | baiṭhāye samīpa gahi pānī ||
bharata binaya suni dekhi subhāū | sithila saneham̐ sabhā raghurāū ||

301.छं॰ 1छन्द

रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु-समाज मुनि मिथिला-धनी ।
मन महँ सराहत भरत भायप, भगति की महिमा घनी ॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत, सुमन मानस मलिन से ।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥

raghurāu sithila saneham̐ sādhu-samāja muni mithilā-dhanī |
mana maham̐ sarāhata bharata bhāyapa, bhagati kī mahimā ghanī ||
bharatahi prasaṃsata bibudha baraṣata, sumana mānasa malina se |
tulasī bikala saba loga suni sakuce nisāgama nalina se ||

301.सो॰ 301सोरठा

देखि दुखारी दीन, दुहुँ समाज नर नारि सब ।
मघवा महा मलीन, मुये मारि मङ्गल चहत ॥

dekhi dukhārī dīna, duhum̐ samāja nara nāri saba |
maghavā mahā malīna, muye māri maṅgala cahata ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0