अयोध्याकाण्ड

अध्याय 299: सेवक को अपने समान बनाने वाले प्रभु

5 श्लोक · 299 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सेवक को अपने समान बनाने वाले प्रभु

आपकी रीति जगत में प्रसिद्ध है। क्रूर, कुटिल, दुष्ट और नीच भी यदि सुनकर शरण में सामने आए और एक बार प्रणाम किया, तो आपने उन्हें अपना लिया। उनके दोष देखकर भी आपने कभी हृदय में नहीं लाए, और उनके गुण सुनकर साधु समाज में बखाने। कौन स्वामी ऐसा है जो सेवक पर कृपा करके उसे अपने समान सब साज सजा दे, अपनी करनी को सपने में भी न गिने, उलटे सेवक के संकोच का सोच हृदय में रखे? मैं भुजा उठाकर प्रण करके कहता हूँ, ऐसा स्वामी दूसरा नहीं। पशु नाचता है, तोता पाठ में प्रवीण होता है, पर गुण और गति सिखाने वाले के अधीन है। इसी प्रकार सेवकों को सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओं का शिरोमणि बनाया।

299.1

राउरि रीति सुबानि बड़ाई । जगत बिदित निगमागम गाई ॥
कूर कुटिल खल कुमति कलङ्की । नीच निसील निरीस निसङ्की ॥

rāuri rīti subāni bar̤āī | jagata bidita nigamāgama gāī ||
kūra kuṭila khala kumati kalaṅkī | nīca nisīla nirīsa nisaṅkī ||

299.2

तेउ सुनि सरन सामुहें आये । सकृत प्रनाम किये अपनाये ॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु-समाज बखाने ॥

teu suni sarana sāmuheṃ āye | sakṛta pranāma kiye apanāye ||
dekhi doṣa kabahum̐ na ura āne | suni guna sādhu-samāja bakhāne ||

299.3

को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समान साज सब साजी ॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोच उर अपनें ॥

ko sāhiba sevakahi nevājī | āpu samāna sāja saba sājī ||
nija karatūti na samujhia sapaneṃ | sevaka sakuca soca ura apaneṃ ||

299.4

सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना । गुन गति नट पाठक आधीना ॥

so gosāim̐ nahiṃ dūsara kopī | bhujā uṭhāi kahaum̐ pana ropī ||
pasu nācata suka pāṭha prabīnā | guna gati naṭa pāṭhaka ādhīnā ||

दो॰ 299दोहा

यों सुधारि सनमानि जन, किये साधु सिरमोर ।
को कृपाल बिनु पालिहै, बिरिदावलि बरजोर ॥

yoṃ sudhāri sanamāni jana, kiye sādhu siramora |
ko kṛpāla binu pālihai, biridāvali barajora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0