राजा मन ही मन पछता रहे हैं, यह दशा देखकर कुमति रानी क्रोधित हुई। बोली, क्या भरत आपके पुत्र नहीं? क्या मुझे दाम देकर खरीद लाए थे? यदि मेरी बात बाण जैसी लगी, तो सोचकर वचन क्यों नहीं दिया? उत्तर दीजिए, हाँ या ना। आप रघुकुल में सत्यप्रतिज्ञ हैं। वर देने को कहा था, अब मत दीजिए, सत्य छोड़िए और अपयश लीजिए। सत्य सराहकर वर देने को कहा, सोचा होगा कि चबेना माँग लेगी! शिबि, दधीचि और बलि ने शरीर और धन देकर भी वचन निभाया। कैकेयी के कड़वे वचन मानो जले पर नमक हैं। धर्मधुरन्धर राजा ने धीरज धरकर आँखें खोलीं, सिर धुनकर लम्बी साँस ली और सोचा, इसने मुझे मर्मस्थान पर मारा है।