अयोध्याकाण्ड

अध्याय 296: श्रीराम जनक की आज्ञा मानने की शपथ लेते हैं

5 श्लोक · 296 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम जनक की आज्ञा मानने की शपथ लेते हैं

कुचाल करके भी सुरराज सोचते हैं कि सारा बनना बिगड़ना भरत के हाथ है। जनक रघुनाथ के पास गए और सूर्यकुल के दीपक ने सबका सम्मान किया। तब रघुवंश के पुरोहित वसिष्ठ समय, समाज और धर्म के अनुकूल बोले। बोले, तात राम, मेरा मत यही है कि तुम जैसी आज्ञा दो, सब वैसा ही करें। यह सुनकर रघुनाथ दोनों हाथ जोड़कर सत्य, सरल और कोमल वाणी में बोले, आपके और मिथिलेश के रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकार अनुचित है। आप और राजा जो आज्ञा दें, आपकी शपथ, वह मैं सिर पर धारण करूँगा। राम की शपथ सुनकर जनक सभा सहित सकुचा गए; सब भरत का मुख देखने लगे, किसी से उत्तर देते नहीं बनता।

296.1

करि कुचालि सोचत सुरराजू । भरत हाथ सब काज अकाजू ॥
गये जनक रघुनाथ समीपा । सनमाने सब रविकुल-दीपा ॥

kari kucāli socata surarājū | bharata hātha saba kāja akājū ||
gaye janaka raghunātha samīpā | sanamāne saba ravikula-dīpā ||

296.2

समय समाज धरम अविरोधा । बोले तब रघुबंस-पुरोधा ॥
जनक भरत सम्बाद सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई ॥

samaya samāja dharama avirodhā | bole taba raghubaṃsa-purodhā ||
janaka bharata sambāda sunāī | bharata kahāuti kahī suhāī ||

296.3

तात राम जस आयसु देहू । सो सब करइ मोर मत एहू ॥
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी । बोले सत्य सरल मृदु बानी ॥

tāta rāma jasa āyasu dehū | so saba karai mora mata ehū ||
suni raghunātha jori juga pānī | bole satya sarala mṛdu bānī ||

296.4

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू । मोर कहब सब भाँति भदेसू ॥
राउर राय रजायसु होई । राउरि सपथ सही सिर सोई ॥

bidyamāna āpuni mithilesū | mora kahaba saba bhām̐ti bhadesū ||
rāura rāya rajāyasu hoī | rāuri sapatha sahī sira soī ||

दो॰ 296दोहा

राम सपथ सुनि सुनि जनक, सकुचे सभा समेत ।
सकल बिलोकत भरत मुख, बनइ न उतरु देत ॥

rāma sapatha suni suni janaka, sakuce sabhā sameta |
sakala bilokata bharata mukha, banai na utaru deta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0