अयोध्याकाण्ड

अध्याय 297: भरत धीरज धरकर बोलने को उठते हैं

5 श्लोक · 297 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत धीरज धरकर बोलने को उठते हैं

सभा को संकोच के वश देखकर राम के भाई भरत ने भारी धीरज धरा। कुसमय देखकर उन्होंने स्नेह को सँभाला, जैसे बढ़ते विन्ध्याचल को अगस्त्य ने रोका था। शोक रूपी हिरण्याक्ष ने उनकी बुद्धि रूपी धरती को, जो निर्मल गुणों की खान है, हर लिया था; उसी समय भरत के विवेक रूपी विशाल वराह ने उसे सहज ही उबार लिया। सबको प्रणाम करके उन्होंने विनती की: आज मेरे बड़े अनुचित को क्षमा कीजिए, कोमल मुख से कठोर वचन कहता हूँ। उन्होंने हृदय में सुहावनी शारदा का स्मरण किया, और वे मानस से उनके मुखकमल पर आ बैठीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से भरी भरत की वाणी सुन्दर हंसिनी है। सीता और रघुराज का स्मरण करके भरत बोले।

297.1

सभा सकुच बस भरत निहारी । रामबन्धु धरि धीरज भारी ॥
कुसमउ देखि सनेह सँभारा । बढ़त बिन्धि जिमि घटज निवारा ॥

sabhā sakuca basa bharata nihārī | rāmabandhu dhari dhīraja bhārī ||
kusamau dekhi saneha sam̐bhārā | bar̤hata bindhi jimi ghaṭaja nivārā ||

297.2

सोक कनकलोचन मति छोनी । हरी बिमल गुन-गन जगजोनी ॥
भरत-बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला ॥

soka kanakalocana mati chonī | harī bimala guna-gana jagajonī ||
bharata-bibeka barāham̐ bisālā | anāyāsa udharī tehi kālā ||

297.3

करि प्रनाम सब कहँ कर जोरे । राम राउ गुरु साधु निहोरे ॥
छमब आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥

kari pranāma saba kaham̐ kara jore | rāma rāu guru sādhu nihore ||
chamaba āju ati anucita morā | kahaum̐ badana mṛdu bacana kaṭhorā ||

297.4

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तैं मुख-पङ्कज आई ॥
बिमल बिबेक धरम नय साली । भरत भारती मञ्जु मराली ॥

hiyam̐ sumirī sāradā suhāī | mānasa taiṃ mukha-paṅkaja āī ||
bimala bibeka dharama naya sālī | bharata bhāratī mañju marālī ||

दो॰ 297दोहा

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि, सिथिल सनेहँ समाज ।
करि प्रनाम बोले भरत, सुमिरि सीय-रघुराज ॥

nirakhi bibeka bilocananhi, sithila saneham̐ samāja |
kari pranāma bole bharata, sumiri sīya-raghurāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0