अयोध्याकाण्ड

अध्याय 295: शारदा भरत की मति फेरने से मना करती हैं

5 श्लोक · 295 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

शारदा भरत की मति फेरने से मना करती हैं

देवताओं ने शारदा से विनती की: अपनी माया से भरत की बुद्धि फेरकर, छल की छाया करके देवकुल को बचाओ। विनती सुनकर चतुर देवी ने देवताओं को स्वार्थी और जड़ जानकर कहा, मुझसे भरत की मति फेरने को कहते हो? हजार आँखों से भी तुम्हें सुमेरु नहीं सूझता। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया भी भरत की मति को देख नहीं सकती; उस मति को भोली करने को मुझसे कहते हो? क्या चाँदनी सूर्य को चुरा सकती है? भरत के हृदय में सीता राम बसते हैं; जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ अँधेरा कैसे? यह कहकर शारदा ब्रह्मलोक चली गईं और देवता रात के चकवों जैसे विकल रह गए। तब मलिन मन वाले स्वार्थी देवताओं ने कुमन्त्रणा करके प्रबल माया रची, जिससे भय, भ्रम, बेचैनी और उचाट फैल गए।

295.1

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही । देबि देव सरनागत पाही ॥
फेरि भरत-मति करि निज माया । पालु बिबुध-कुल करि छल छाया ॥

suranha sumiri sāradā sarāhī | debi deva saranāgata pāhī ||
pheri bharata-mati kari nija māyā | pālu bibudha-kula kari chala chāyā ||

295.2

बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी । बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ॥
मो सन कहहु भरत मति फेरू । लोचन सहस न सूझ सुमेरू ॥

bibudha binaya suni debi sayānī | bolī sura svāratha jar̤a jānī ||
mo sana kahahu bharata mati pherū | locana sahasa na sūjha sumerū ||

295.3

बिधि-हरि-हर माया बड़ि भारी । सोउ न भरत-मति सकइ निहारी ॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी । चन्दिनि कर कि चंडकर चोरी ॥

bidhi-hari-hara māyā bar̤i bhārī | sou na bharata-mati sakai nihārī ||
so mati mohi kahata karu bhorī | candini kara ki caṃḍakara corī ||

295.4

भरत हृदयँ सिय-राम निवासू । तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ॥
अस कहि सारद गइ बिधि-लोका । बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ॥

bharata hṛdayam̐ siya-rāma nivāsū | taham̐ ki timira jaham̐ tarani prakāsū ||
asa kahi sārada gai bidhi-lokā | bibudha bikala nisi mānahum̐ kokā ||

दो॰ 295दोहा

सुर स्वारथी मलीन मन, कीन्ह कुमन्त्र कुठार ।
रचि प्रपञ्च माया प्रबल, भय भ्रम अरति उचाटु ॥

sura svārathī malīna mana, kīnha kumantra kuṭhāra |
raci prapañca māyā prabala, bhaya bhrama arati ucāṭu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0