अयोध्याकाण्ड

अध्याय 294: इन्द्र भरत के राम प्रेम से डरते हैं

5 श्लोक · 294 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

इन्द्र भरत के राम प्रेम से डरते हैं

भरत के वचन सुनकर और स्वभाव देखकर राजा समाज सहित सराहना करते हैं। उनकी वाणी सुगम भी है अगम भी, कोमल भी कठोर भी; अक्षर थोड़े और अर्थ अपार। जैसे दर्पण में मुख दिखे पर पकड़ में न आए, ऐसी अद्भुत वाणी है। राजा, भरत, मुनि और साधु समाज वहाँ गए जहाँ देवरूपी कुमुदों के चन्द्रमा राम थे। सुन सुनकर सब लोग सोच से विकल हैं, जैसे नए जल के योग में मछलियाँ। देवताओं ने पहले कुलगुरु की दशा देखी, फिर विदेह का विशेष स्नेह, फिर राम भक्ति से भरे भरत, और स्वार्थी देवता हिम्मत हार गए। सबको राम प्रेममय देखकर इन्द्र अपार सोच में पड़ गए। सोच के साथ सुरराज ने कहा, राम स्नेह और संकोच के वश हैं; सब मिलकर कोई प्रपंच रचो, नहीं तो काम बिगड़ गया।

294.1

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ । सहित समाज सराहत राऊ ॥
सुगम अगम मृदु मञ्जु कठोरे । अरथ अमित अति आखर थोरे ॥

bharata bacana suni dekhi subhāū | sahita samāja sarāhata rāū ||
sugama agama mṛdu mañju kaṭhore | aratha amita ati ākhara thore ||

294.2

ज्यौ मुख मुकुर मुकुर निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥
भूप भरत मुनि साधु समाजू । गे जहँ बिबुध-कुमुद-द्विजराजू ॥

jyau mukha mukura mukura nija pānī | gahi na jāi asa adabhuta bānī ||
bhūpa bharata muni sādhu samājū | ge jaham̐ bibudha-kumuda-dvijarājū ||

294.3

सुनि सुनि सोच बिकल सब लोगा । मनहुँ मीन-गन नव जल जोगा ॥
देवँ प्रथम कुल-गुरु गति देखी । निरखि बिदेह सनेह बिसेखी ॥

suni suni soca bikala saba logā | manahum̐ mīna-gana nava jala jogā ||
devam̐ prathama kula-guru gati dekhī | nirakhi bideha saneha bisekhī ||

294.4

राम भगति-मय भरत निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ॥
सब कोउ राम-प्रेम-मय पेखा । भउ अलेख सोच बस लेखा ॥

rāma bhagati-maya bharata nihāre | sura svārathī hahari hiyam̐ hāre ||
saba kou rāma-prema-maya pekhā | bhau alekha soca basa lekhā ||

दो॰ 294दोहा

राम सनेह सकोच बस, कह ससोच सुरराज ।
रचहु प्रपञ्चहि पञ्च मिलि, नाहिँ त भयउ अकाज ॥

rāma saneha sakoca basa, kaha sasoca surarāja |
racahu prapañcahi pañca mili, nāhim̐ ta bhayau akāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0