अगम सबहि बरनत बरबरनी । जिमि जलहीन मीन गमु धरनी ॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी । जानहिँ रामु न सकहिँ बखानी ॥
agama sabahi baranata barabaranī | jimi jalahīna mīna gamu dharanī ||
bharata amita mahimā sunu rānī | jānahim̐ rāmu na sakahim̐ bakhānī ||
5 श्लोक · 289 में से 326
जनक कहते हैं, भरत का वर्णन सबके लिये वैसे ही अगम है जैसे बिना जल की मछली का धरती पर चलना। भरत की अपार महिमा को राम जानते हैं, पर वे भी बखान नहीं सकते। पत्नी की रुचि देखकर राजा बोले, लक्ष्मण लौटें और भरत वन जाएँ, इसमें सबका भला है। पर देवि, भरत और रघुबर की प्रीति और परस्पर विश्वास तौला नहीं जा सकता। भरत स्नेह और ममता की सीमा हैं, यद्यपि राम समता की सीमा हैं। परमार्थ, स्वार्थ और सुख को भरत ने सपने में भी नहीं देखा। राम चरणों का प्रेम ही उनका साधन और सिद्धि है, मुझे भरत का यही मत दीखता है। राजा ने बिलखकर कहा, स्नेहवश सोच मत करो, भरत भूलकर भी, मन से भी राम की आज्ञा नहीं टालेंगे।
अगम सबहि बरनत बरबरनी । जिमि जलहीन मीन गमु धरनी ॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी । जानहिँ रामु न सकहिँ बखानी ॥
agama sabahi baranata barabaranī | jimi jalahīna mīna gamu dharanī ||
bharata amita mahimā sunu rānī | jānahim̐ rāmu na sakahim̐ bakhānī ||
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ । तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ ॥
बहुरहिँ लखन भरत बन जाहीँ । सब कर भल सब के मन माहीँ ॥
barani saprema bharata anubhāū | tiya jiya kī ruci lakhi kaha rāū ||
bahurahim̐ lakhana bharata bana jāhīm̐ | saba kara bhala saba ke mana māhīm̐ ||
देबि परन्तु भरत रघुबर की । प्रीति प्रतीति जाइ नहिँ तर की ॥
भरत अवधि सनेह ममता की । जद्यपि राम सीम समता की ॥
debi parantu bharata raghubara kī | prīti pratīti jāi nahim̐ tara kī ||
bharata avadhi saneha mamatā kī | jadyapi rāma sīma samatā kī ||
परमारथ स्वारथ सुख सारे । भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ॥
साधन सिद्धि राम-पग-नेहू । मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥
paramāratha svāratha sukha sāre | bharata na sapanehum̐ manahum̐ nihāre ||
sādhana siddhi rāma-paga-nehū | mohi lakhi parata bharata mata ehū ||
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं, मनसहुँ राम रजाइ ।
करिय न सोच सनेह बस, कहेउ भूप बिलखाइ ॥
bhorehum̐ bharata na pelihahiṃ, manasahum̐ rāma rajāi |
kariya na soca saneha basa, kaheu bhūpa bilakhāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0