अयोध्याकाण्ड

अध्याय 288: जनक कहते हैं, भरत की महिमा अकथनीय

5 श्लोक · 288 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

जनक कहते हैं, भरत की महिमा अकथनीय

भरत का व्यवहार सुनकर, राजा ने सजल नेत्र मूँद लिये, तन पुलकित हो गया और वे प्रसन्न मन से उनके यश की सराहना करने लगे। बोले, हे सुमुखी, सावधान होकर सुनो; भरत की कथा भवबन्धन छुड़ाने वाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार में मेरी बुद्धि यथाशक्ति चलती है, पर वह भरत की महिमा की छाया को भी छल से भी नहीं छू पाती। ब्रह्मा, शिव, शारदा और कवि सबको भरत का चरित्र, कीर्ति, करनी, समझने सुनने में सुखद लगते हैं, जो पवित्रता में गंगा और स्वाद में अमृत को भी मात करते हैं। भरत असीम गुणों वाले अनुपम पुरुष हैं; भरत के समान भरत ही हैं। क्या सुमेरु को सेर के बराबर कहा जाए? कवियों की बुद्धि भी सकुचा जाती है।

288.1

सुनि भूपाल भरत व्यवहारू । सोन सुगन्ध सुधा ससि-सारू ॥
मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजस सराहन लगे मुदित मन ॥

suni bhūpāla bharata vyavahārū | sona sugandha sudhā sasi-sārū ||
mūde sajala nayana pulake tana | sujasa sarāhana lage mudita mana ||

288.2

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव-बन्ध बिमोचनि ॥
धरम राज-नय ब्रह्म-बिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू ॥

sāvadhāna sunu sumukhi sulocani | bharata kathā bhava-bandha bimocani ||
dharama rāja-naya brahma-bicārū | ihām̐ jathāmati mora pracārū ||

288.3

सो मति मोरि भरत महिमाही । कहइ काह छलि छुअति न छाँही ॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि-बिसारद ॥

so mati mori bharata mahimāhī | kahai kāha chali chuati na chām̐hī ||
bidhi ganapati ahipati siva sārada | kabi kobida budha buddhi-bisārada ||

288.4

भरत चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन बिमल बिभूती ॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥

bharata carita kīrati karatūtī | dharama sīla guna bimala bibhūtī ||
samujhata sunata sukhada saba kāhū | suci surasari ruci nidara sudhāhū ||

दो॰ 288दोहा

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु, भरतु भरत सम जानि ।
कहिअ सुमेरु कि सेर सम, कबिकुल मति सकुचानि ॥

niravadhi guna nirupama puruṣu, bharatu bharata sama jāni |
kahia sumeru ki sera sama, kabikula mati sakucāni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0