राम-भरत-गुन-गनत सप्रीती । निसि दम्पतिहि पलक सम बीती ॥
राज समाज प्रात जुग जागे । न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ॥
rāma-bharata-guna-ganata saprītī | nisi dampatihi palaka sama bītī ||
rāja samāja prāta juga jāge | nhāi nhāi sura pūjana lāge ||
5 श्लोक · 290 में से 326
राम और भरत के गुण प्रेम से गिनते गिनते राजा रानी की रात पलक के समान बीत गई। प्रातः दोनों राजसमाज जागे और नहा नहाकर देवपूजन करने लगे। रघुराई नहाकर गुरु के पास गए, चरण वन्दकर बोले, नाथ, भरत, पुरजन और माताएँ शोक से विकल हैं। मिथिलेश भी समाज सहित बहुत दिनों से क्लेश सह रहे हैं। हे नाथ, जो उचित हो वही कीजिए, सबका हित आपके हाथ है। ऐसा कहकर रघुराज बहुत सकुचा गए, और उनका शील स्वभाव देखकर मुनि पुलकित हो उठे। वसिष्ठ बोले, हे राम, तुम्हारे बिना सुख के सारे साज दोनों राजसमाजों को नरक के समान हैं। तुम प्राणों के प्राण, जीव के जीव और सुख के सुख हो; हे तात, तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, विधाता उनके विपरीत है।
राम-भरत-गुन-गनत सप्रीती । निसि दम्पतिहि पलक सम बीती ॥
राज समाज प्रात जुग जागे । न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ॥
rāma-bharata-guna-ganata saprītī | nisi dampatihi palaka sama bītī ||
rāja samāja prāta juga jāge | nhāi nhāi sura pūjana lāge ||
गे नहाइ गुरु पहिँ रघुराई । बन्दि चरन बोले रुख पाई ॥
नाथ भरत पुरजन महँतारी । सोक बिकल बनबास दुखारी ॥
ge nahāi guru pahim̐ raghurāī | bandi carana bole rukha pāī ||
nātha bharata purajana maham̐tārī | soka bikala banabāsa dukhārī ||
सहित समाज राउ मिथिलेसू । बहुत दिवस भये सहत कलेसू ॥
उचित होइ सोइ कीजिय नाथा । हित सबही कर रौरें हाथा ॥
sahita samāja rāu mithilesū | bahuta divasa bhaye sahata kalesū ||
ucita hoi soi kījiya nāthā | hita sabahī kara raureṃ hāthā ||
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ । मुनि पुलके लखि सील सुभाऊ ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा । नरक सरिस दुहुँ राज-समाजा ॥
asa kahi ati sakuce raghurāū | muni pulake lakhi sīla subhāū ||
tumha binu rāma sakala sukha sājā | naraka sarisa duhum̐ rāja-samājā ||
प्रान प्रान के जीव के, जिव सुख के सुख राम ।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह, जिन्हहिं तिन्हहिं बिधि बाम ॥
prāna prāna ke jīva ke, jiva sukha ke sukha rāma |
tumha taji tāta sohāta gṛha, jinhahiṃ tinhahiṃ bidhi bāma ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0