अयोध्याकाण्ड

अध्याय 277: राम प्रेम बिना ज्ञान बिना माँझी की नाव

5 श्लोक · 277 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम प्रेम बिना ज्ञान बिना माँझी की नाव

जिनका ज्ञान सूर्य संसार की रात को मिटा देता है, क्या उन जनक के पास मोह और ममता आ सकती है? यह शोक तो सिय राम के प्रति उनके स्नेह की बड़ाई है। वेद जगत में तीन प्रकार के जीव बताते हैं, विषयी, साधक और सिद्ध; इनमें जिसका मन राम स्नेह से सरस है, साधु सभा में उसी का बड़ा आदर है। राम प्रेम के बिना ज्ञान नहीं सोहता, जैसे बिना कर्णधार के जलयान। वसिष्ठ ने विदेह को बहुत प्रकार समझाया और सबने रामघाट पर स्नान किया। वह दिन बिना जल के बीता; पशु पक्षियों तक ने आहार नहीं किया। दूसरे दिन प्रातः निमिराज और रघुराज दोनों समाज सहित नहाकर वटवृक्ष के नीचे बैठे, मन मलिन और देह दुर्बल।

277.1

जासु ज्ञान रवि भव-निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥
तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय-राम सनेह बड़ाई ॥

jāsu jñāna ravi bhava-nisi nāsā | bacana kirana muni kamala bikāsā ||
tehi ki moha mamatā niarāī | yaha siya-rāma saneha bar̤āī ||

277.2

विषयी साधक सिद्ध सयाने । त्रिविधि जीव जग बेद बखाने ॥
राम-सनेह-सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ॥

viṣayī sādhaka siddha sayāne | trividhi jīva jaga beda bakhāne ||
rāma-saneha-sarasa mana jāsū | sādhu sabhām̐ bar̤a ādara tāsū ||

277.3

सोह न राम-पेम बिनु ज्ञानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥
मुनि बहु बिधि बिदेह समुझाये । रामघाट सब लोग नहायें ॥

soha na rāma-pema binu jñānū | karanadhāra binu jimi jalajānū ||
muni bahu bidhi bideha samujhāye | rāmaghāṭa saba loga nahāyeṃ ||

277.4

सकल सोक-सङ्कुल नर नारी । सो बासर बीतेउ बिनु बारी ॥
पसु-खग-मृगन्ह न कीन्ह अहारू । प्रिय परिजन कर कवन बिचारू ॥

sakala soka-saṅkula nara nārī | so bāsara bīteu binu bārī ||
pasu-khaga-mṛganha na kīnha ahārū | priya parijana kara kavana bicārū ||

दो॰ 277दोहा

दोउ समाज निमिराज रघु-राज नहाने प्रात ।
बैठे सब बट बिटप तर, मन मलीन कृस गात ॥

dou samāja nimirāja raghu-rāja nahāne prāta |
baiṭhe saba baṭa biṭapa tara, mana malīna kṛsa gāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0