बोरति ज्ञान-बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे ॥
सोच उसास समीर तंरगा । धीरज तट तरुबर कर भङ्गा ॥
borati jñāna-birāga karāre | bacana sasoka milata nada nāre ||
soca usāsa samīra taṃragā | dhīraja taṭa tarubara kara bhaṅgā ||
6 श्लोक · 276 में से 326
उपमा आगे चलती है। यह करुणा की नदी ज्ञान और वैराग्य के किनारे डुबोती है; शोक भरे वचन उसके नदी नाले हैं, उसाँसें उसकी तरंगें, और वह धीरज के वृक्ष तोड़ती है। भय और भ्रम उसके भँवर हैं। विद्वान केवट बड़ी नावें लिये भी न खे पाते हैं, न थाह पाते हैं, और कोल किरात थके पथिकों की भाँति देखते रहते हैं। आश्रम के समुद्र में मिलते ही मानो समुद्र ही व्याकुल हो उठा। दोनों राजसमाज ज्ञान, धीरज और लाज खो बैठे, दशरथ के गुण गाकर रोते हैं और विधाता को दोष देते हैं। विदेह की दशा देखकर देव, सिद्ध और योगी भी मानते हैं कि स्नेह की नदी कोई नहीं तर सकता। तब वसिष्ठ जनक से धैर्य धरने को कहते हैं।
बोरति ज्ञान-बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे ॥
सोच उसास समीर तंरगा । धीरज तट तरुबर कर भङ्गा ॥
borati jñāna-birāga karāre | bacana sasoka milata nada nāre ||
soca usāsa samīra taṃragā | dhīraja taṭa tarubara kara bhaṅgā ||
बिषम विषाद तोरावति धारा । भय भ्रम भवँर अवर्त अपारा ॥
केवट-बुध बिद्या बडि नावा । सकहिँ न खेइ अइक नहिँ आवा ॥
biṣama viṣāda torāvati dhārā | bhaya bhrama bhavam̐ra avarta apārā ||
kevaṭa-budha bidyā baḍi nāvā | sakahim̐ na khei aika nahim̐ āvā ||
बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥
आस्रम-उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अम्बुधि अकुलाई ॥
banacara kola kirāta bicāre | thake biloki pathika hiyam̐ hāre ||
āsrama-udadhi milī jaba jāī | manahum̐ uṭheu ambudhi akulāī ||
सोक बिकल दोउ राज-समाजा । रहा न ज्ञान न धीरज लाजा ॥
भूप-रूप-गुन-सील सराही । रोवहिं सोक-सिन्धु अवगाही ॥
soka bikala dou rāja-samājā | rahā na jñāna na dhīraja lājā ||
bhūpa-rūpa-guna-sīla sarāhī | rovahiṃ soka-sindhu avagāhī ||
अवगाहि सोक-समुद्र सोचहिँ, नारि नर व्याकुल महा ।
दै दोष सकल सरोष बोलहिँ, बाम बिधि कीन्हो कहा ॥
सुर सिद्ध तापस जोगि जन मुनि, देखि दसा बिदेह की ।
तुलसी न समरथ कोउ जो तरि, सकइ सरित सनेह की ॥
avagāhi soka-samudra socahim̐, nāri nara vyākula mahā |
dai doṣa sakala saroṣa bolahim̐, bāma bidhi kīnho kahā ||
sura siddha tāpasa jogi jana muni, dekhi dasā bideha kī |
tulasī na samaratha kou jo tari, sakai sarita saneha kī ||
किये अमित उपदेस, जहँ तहँ लोगन्ह मुनिवरन्ह ।
धीरज धरिअ नरेस, कहेउ बसिष्ठ विदेह सन ॥
kiye amita upadesa, jaham̐ taham̐ loganha munivaranha |
dhīraja dharia naresa, kaheu basiṣṭha videha sana ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0