अयोध्याकाण्ड

अध्याय 278: सभा में उपदेश और वनवासियों के फल

5 श्लोक · 278 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सभा में उपदेश और वनवासियों के फल

अयोध्या और मिथिला के ब्राह्मण, सूर्यवंश के गुरु वसिष्ठ और जनक के पुरोहित, जिन्होंने संसार में रहकर परमार्थ साधा, धर्म, नीति, वैराग्य और विवेक सहित अनेक उपदेश देने लगे। विश्वामित्र पुरानी कथाएँ कहकर मधुर वाणी से पूरी सभा को समझाते हैं। तब रघुनाथ कौशिक से कहते हैं, नाथ, कल सब बिना जल के रहे। मुनि कहते हैं, रघुराई उचित कहते हैं, आज भी ढाई पहर बीत गए। ऋषि का रुख देखकर तिरहुत के राजा कहते हैं कि यहाँ अन्न का भोजन उचित नहीं। राजा की बात सबको भली लगी और आज्ञा पाकर सब नहाने चले। उसी समय वनवासी अनेक प्रकार के फल, फूल, पत्ते और मूल काँवरों में भर भरकर ले आए।

278.1

जे महिसुर दसरथ पुर बासी । जे मिथिलापति नगर निवासी ॥
हंस बंस गुरु जनक पुरोधा । जिन्ह जग मग परमारथ सोधा ॥

je mahisura dasaratha pura bāsī | je mithilāpati nagara nivāsī ||
haṃsa baṃsa guru janaka purodhā | jinha jaga maga paramāratha sodhā ||

278.2

लगे कहन उपदेस अनेका । सहित धरम नय बिरति बिबेका ॥
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं । समुझाई सब सभा सुबानीं ॥

lage kahana upadesa anekā | sahita dharama naya birati bibekā ||
kausika kahi kahi kathā purānīṃ | samujhāī saba sabhā subānīṃ ||

278.3

तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ । नाथ कालि जल बिनु सब रहेऊ ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई । गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई ॥

taba raghunātha kosikahi kaheū | nātha kāli jala binu saba raheū ||
muni kaha ucita kahata raghurāī | gayau bīti dina pahara ar̤hāī ||

278.4

रिषि रुख लखि कह तिरहुति राजू । इहाँ उचित नहिँ असन अनाजू ॥
कहा भूप भल सबहि सोहाना । पाइ रजायसु चले नहाना ॥

riṣi rukha lakhi kaha tirahuti rājū | ihām̐ ucita nahim̐ asana anājū ||
kahā bhūpa bhala sabahi sohānā | pāi rajāyasu cale nahānā ||

दो॰ 278दोहा

तेहि अवसर फल फूल दल, मूल अनेक प्रकार ।
लइ आये बनचर बिपुल, भरि भरि काँवरि भार ॥

tehi avasara phala phūla dala, mūla aneka prakāra |
lai āye banacara bipula, bhari bhari kām̐vari bhāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0