दूतन्ह आइ भरत कइ करनी । जनक-समाज जथामति बरनी ॥
सुनि गुरु परिजन सचिव महीपति । भे सब सोच-सनेहँ बिकल अति ॥
dūtanha āi bharata kai karanī | janaka-samāja jathāmati baranī ||
suni guru parijana saciva mahīpati | bhe saba soca-saneham̐ bikala ati ||
5 श्लोक · 272 में से 326
दूतों ने आकर जनक के समाज से अपनी बुद्धि के अनुसार भरत की करनी कही। सुनकर गुरु, परिवार, मंत्री और राजा सब सोच और स्नेह से बहुत व्याकुल हो गए। धीरज धरकर और भरत की बड़ाई करके राजा ने अच्छे योद्धाओं और सेनापतियों को बुलाया। देश की रखवाली रखकर रथ, हाथी और घोड़े सजाए। दो घड़ी का मुहूर्त साधकर तुरंत चल पड़े, राजा ने मार्ग में विश्राम नहीं किया। आज सबेरे प्रयाग में नहाकर चले हैं, सब यमुना उतरने लगे हैं। नाथ, हमें समाचार लेने भेजा है। मुनिवर छह सात किरात साथ देकर दूतों को तुरंत विदा करते हैं। जनक का आना सुनकर अवध का समाज हर्षित होता है। रघुनन्दन को बड़ा संकोच होता है और देवराज सोच के वश हो जाते हैं।
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी । जनक-समाज जथामति बरनी ॥
सुनि गुरु परिजन सचिव महीपति । भे सब सोच-सनेहँ बिकल अति ॥
dūtanha āi bharata kai karanī | janaka-samāja jathāmati baranī ||
suni guru parijana saciva mahīpati | bhe saba soca-saneham̐ bikala ati ||
धरि धीरज करि भरत बड़ाई । लिये सुभट साहनी बोलाई ॥
घर-पुर-देस राखि रखवारे । हय गय रथ बहु जान सँवारे ॥
dhari dhīraja kari bharata bar̤āī | liye subhaṭa sāhanī bolāī ||
ghara-pura-desa rākhi rakhavāre | haya gaya ratha bahu jāna sam̐vāre ||
दुघरी साधि चले ततकाला । किय बिश्राम न मग महिपाला ॥
भोरहिँ आजु नहाइ प्रयागा । चले जमुन उतरन सब लागा ॥
dugharī sādhi cale tatakālā | kiya biśrāma na maga mahipālā ||
bhorahim̐ āju nahāi prayāgā | cale jamuna utarana saba lāgā ||
खबरि लेन हम पठये नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥
साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥
khabari lena hama paṭhaye nāthā | tinha kahi asa mahi nāyau māthā ||
sātha kirāta cha sātaka dīnhe | munibara turata bidā cara kīnhe ||
सुनत जनक आगवन सब, हरषेउ अवध-समाज ।
रघुनन्दनहिँ सकोच बड़, सोच बिबस सुर-राज ॥
sunata janaka āgavana saba, haraṣeu avadha-samāja |
raghunandanahim̐ sakoca bar̤a, soca bibasa sura-rāja ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0