अयोध्याकाण्ड

अध्याय 271: जनकपुर में अवध का समाचार

5 श्लोक · 271 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

जनकपुर में अवध का समाचार

दूत कहता है, कोसलपति की गति सुनकर जनकपुर के सब लोग शोक से बावले हो गए। जिसने उस समय विदेह को देखा, उसे उनका नाम सच्चा नहीं लगा। रानी की कुचाल सुनकर राजा को ऐसे कुछ नहीं सूझा जैसे मणि बिना साँप को। भरत को राज और रघुवर को वनवास, यह सुनकर मिथिलेश के हृदय में बड़ा दुख हुआ। मंत्री भी न कह सके कि चलें या रहें। तब राजा ने धीरज धरकर मन में विचारकर चार चतुर दूत अवध भेजे कि भरत का सच्चा या बुरा भाव पूछकर जल्दी लौट आना, किसी को पता न चले। दूत अवध गए, भरत की करनी देखी, और जब भरत चित्रकूट चले तब वे तिरहुत लौट चले।

271.1

कोसलपति गति सुनि जनकौरा । भे सब लोग सोक-बस बौरा ॥
जेहिं देखे तेहि समय विदेहू । नाम सत्य अस लाग न केहू ॥

kosalapati gati suni janakaurā | bhe saba loga soka-basa baurā ||
jehiṃ dekhe tehi samaya videhū | nāma satya asa lāga na kehū ||

271.2

रानि कुचालि सुनत नरपालहि । सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥
भरत-राज रघुबर-बनबासू । भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ॥

rāni kucāli sunata narapālahi | sūjha na kachu jasa mani binu byālahi ||
bharata-rāja raghubara-banabāsū | bhā mithilesahi hṛdayam̐ harām̐sū ||

271.3

नृप बूझे बुध-सचिव-समाजू । कहहु बिचारि उचित का आजू ॥
समुझि अवध असमंजस दोऊ । चलिय कि रहिय न कह कछु कोऊ ॥

nṛpa būjhe budha-saciva-samājū | kahahu bicāri ucita kā ājū ||
samujhi avadha asamaṃjasa doū | caliya ki rahiya na kaha kachu koū ||

271.4

नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी । पठये अवध चतुर चर चारी ॥
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ । आएहु बेगि न होइ लखाऊ ॥

nṛpahi dhīra dhari hṛdayam̐ bicārī | paṭhaye avadha catura cara cārī ||
būjhi bharata sati bhāu kubhāū | āehu begi na hoi lakhāū ||

दो॰ 271दोहा

गये अवध चर भरत-गति, बूझि देखि करतूति ।
चले चित्रकूटहि भरत, चार चले तेरहूति ॥

gaye avadha cara bharata-gati, būjhi dekhi karatūti |
cale citrakūṭahi bharata, cāra cale terahūti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0