भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥
असमंजस-बस अवध-नेवासी । प्रमुदित मन तापस बन-बासी ॥
bharata bacana suci suni sura haraṣe | sādhu sarāhi sumana sura baraṣe ||
asamaṃjasa-basa avadha-nevāsī | pramudita mana tāpasa bana-bāsī ||
5 श्लोक · 270 में से 326
भरत के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित होते हैं और फूल बरसाते हैं। अवधवासी असमंजस में हैं, जबकि तपस्वी और वनवासी मन में प्रसन्न हैं। संकोची रघुनाथ चुप रह जाते हैं, प्रभु की यह दशा देखकर सारी सभा सोच में पड़ जाती है। उसी समय जनक के दूत आते हैं। सुनकर मुनि वसिष्ठ उन्हें पास बुलाते हैं। वे प्रणाम करके राम को देखते हैं और उनका वेष देखकर बहुत दुखी होते हैं। मुनिवर दूतों से पूछते हैं, विदेहराज की कुशल कहो। सुनकर वे सकुचाकर धरती पर माथा नवाते हैं और श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर कहता है, स्वामी, आपका आदर से पूछना ही कुशल का कारण हो गया। नहीं तो नाथ, कुशल तो कोसलनाथ के साथ चली गई। मिथिला और अवध विशेष रूप से, सारा जग अनाथ हो गया।
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥
असमंजस-बस अवध-नेवासी । प्रमुदित मन तापस बन-बासी ॥
bharata bacana suci suni sura haraṣe | sādhu sarāhi sumana sura baraṣe ||
asamaṃjasa-basa avadha-nevāsī | pramudita mana tāpasa bana-bāsī ||
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥
जनक-दूत तेहि अवसर आये । मुनि बसिष्ठँ सुनि निकट बोलाये ॥
cupahiṃ rahe raghunātha sam̐kocī | prabhu gati dekhi sabhā saba socī ||
janaka-dūta tehi avasara āye | muni basiṣṭham̐ suni nikaṭa bolāye ||
करि प्रनाम तिन्ह राम निहारे । बेष देखि भये निपट दुखारे ॥
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता । कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥
kari pranāma tinha rāma nihāre | beṣa dekhi bhaye nipaṭa dukhāre ||
dūtanha munibara būjhī bātā | kahahu bideha bhūpa kusalātā ||
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा । बोले चर-बर जोरें हाथा ॥
बूझब राउर सादर साँई । कुसल-हेतु सो भयउ गोसाँई ॥
suni sakucāi nāi mahi māthā | bole cara-bara joreṃ hāthā ||
būjhaba rāura sādara sām̐ī | kusala-hetu so bhayau gosām̐ī ||
नाहि त कोसल नाथ कें, साथ कुसल गइ नाथ ।
मिथिला अवध बिसेष तेँ, जग सब भयउ अनाथ ॥
nāhi ta kosala nātha keṃ, sātha kusala gai nātha |
mithilā avadha biseṣa tem̐, jaga saba bhayau anātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0