अयोध्याकाण्ड

अध्याय 27: कैकेयी का कपट और वरदान की माँग

5 श्लोक · 27 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कैकेयी का कपट और वरदान की माँग

उसे हितैषी जानकर राजा प्रेम से पुलकित होकर बोले: भामिनी, तुम्हारे मन की बात हो गई, घर-घर में बधाई है। कल श्रीराम को युवराज बनाऊँगा, सुलोचनी, मंगल साज सजाओ। यह सुनकर उसका कठोर हृदय ऐसे दलक उठा मानो पका फोड़ा छू गया हो। ऐसी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती। राजा उसकी कपट-चतुराई नहीं देख सके, क्योंकि कुटिलों के शिरोमणि गुरु ने उसे पढ़ाया था। राजा नीति में निपुण हैं, पर स्त्रीचरित्र अथाह समुद्र है। कपट स्नेह बढ़ाकर, मुँह फेरकर हँसती हुई वह बोली: प्रियतम, माँग-माँग कहते हो, पर देते-लेते कभी नहीं। दो वरदान कहे थे, उनमें भी सन्देह है।

27.1

पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी । प्रेम पुलकि मृदु मञ्जुल बानी ॥
भामिनि भयउ तोर मन भावा । घर घर नगर अनन्द-बधावा ॥

puni kaha rāu suhrada jiyam̐ jānī | prema pulaki mṛdu mañjula bānī ||
bhāmini bhayau tora mana bhāvā | ghara ghara nagara ananda-badhāvā ||

27.2

रामहिँ देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मङ्गल-साजू ॥
दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू । जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू ॥

rāmahim̐ deum̐ kāli jubarājū | sajahi sulocani maṅgala-sājū ||
dalaki uṭheu suni hradau kaṭhorū | janu chui gayau pāka baratorū ||

27.3

ऐसिउ पीर बिहँसि तेहि गोई । चोर-नारि जिमि प्रगटि न रोई ॥
लखी न भूप कपट चतुराई । कोटि कुटिल-मनि गुरू पढ़ाई ॥

aisiu pīra biham̐si tehi goī | cora-nāri jimi pragaṭi na roī ||
lakhī na bhūpa kapaṭa caturāī | koṭi kuṭila-mani gurū par̤hāī ||

27.4

जद्यपि नीति-निपुन नर-नाहू । नारि-चरित जलनिधि अवगाहू ॥
कपट सनेह बढ़ाइ बहोरी । बोली बिहँसि नयन मुँह मोरी ॥

jadyapi nīti-nipuna nara-nāhū | nāri-carita jalanidhi avagāhū ||
kapaṭa saneha bar̤hāi bahorī | bolī biham̐si nayana mum̐ha morī ||

दो॰ 27दोहा

माँगु माँगु पै कहहु पिय, कबहुँ न देहु न लेहु ।
देन कहेहु बरदान दुइ, तेउ पावत सन्देहु ॥

mām̐gu mām̐gu pai kahahu piya, kabahum̐ na dehu na lehu |
dena kahehu baradāna dui, teu pāvata sandehu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0