उसे हितैषी जानकर राजा प्रेम से पुलकित होकर बोले: भामिनी, तुम्हारे मन की बात हो गई, घर-घर में बधाई है। कल श्रीराम को युवराज बनाऊँगा, सुलोचनी, मंगल साज सजाओ। यह सुनकर उसका कठोर हृदय ऐसे दलक उठा मानो पका फोड़ा छू गया हो। ऐसी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती। राजा उसकी कपट-चतुराई नहीं देख सके, क्योंकि कुटिलों के शिरोमणि गुरु ने उसे पढ़ाया था। राजा नीति में निपुण हैं, पर स्त्रीचरित्र अथाह समुद्र है। कपट स्नेह बढ़ाकर, मुँह फेरकर हँसती हुई वह बोली: प्रियतम, माँग-माँग कहते हो, पर देते-लेते कभी नहीं। दो वरदान कहे थे, उनमें भी सन्देह है।