अयोध्याकाण्ड

अध्याय 264: राम भरत से अपनी इच्छा कहने को कहते हैं

5 श्लोक · 264 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम भरत से अपनी इच्छा कहने को कहते हैं

राम कहते हैं, मैं स्वभाव से सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, भरत, धरती तुम्हारी रखी हुई ही टिकी है। तात, व्यर्थ कुतर्क मत करो, वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। पक्षी और पशु मुनियों के पास जाते हैं और हिंसक बधिक को देखकर भागते हैं। हित और अनहित पशु पक्षी भी जानते हैं। तात, मैं तुम्हें भली भाँति जानता हूँ, पर क्या करूँ, मन में असमंजस है। राजा ने मुझे त्यागकर सत्य रखा और प्रेम के प्रण के लिए शरीर छोड़ा। उनके वचन मिटाने में बड़ा सोच है, उससे भी अधिक तुम्हारा संकोच। उस पर गुरु ने मुझे आज्ञा दी है। मन प्रसन्न करके संकोच छोड़कर कहो, वही आज करूँगा। सत्यसंध रघुवर के वचन सुनकर समाज सुखी होता है।

264.1

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी ॥
तात कुतरक करहु जनि जाये । बैर पेम नहिँ दुरइ दुराये ॥

kahaum̐ subhāu satya siva sākhī | bharata bhūmi raha rāuri rākhī ||
tāta kutaraka karahu jani jāye | baira pema nahim̐ durai durāye ||

264.2

मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीँ । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ज्ञान निधाना ॥

muni gana nikaṭa bihaga mṛga jāhīm̐ | bādhaka badhika biloki parāhīṃ ||
hita anahita pasu pacchiu jānā | mānuṣa tanu guna jñāna nidhānā ||

264.3

तात तुम्हहिँ मैं जानउँ नीकें । करउँ काह असमंजस जी के ॥
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ पेम-पन-लागी ॥

tāta tumhahim̐ maiṃ jānaum̐ nīkeṃ | karaum̐ kāha asamaṃjasa jī ke ||
rākheu rāyam̐ satya mohi tyāgī | tanu parihareu pema-pana-lāgī ||

264.4

तासु बचन मेटत बड़ सोचू । तेहि तेँ अधिक तुम्हार सँकोचू ॥
ता पर गुरु मोहि आयसु दीन्हा । अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥

tāsu bacana meṭata bar̤a socū | tehi tem̐ adhika tumhāra sam̐kocū ||
tā para guru mohi āyasu dīnhā | avasi jo kahahu cahaum̐ soi kīnhā ||

दो॰ 264दोहा

मन प्रसन्न कर सकुच तजि, कहहु करउँ सोइ आज ।
सत्यसन्ध रघुबर बचन, सुनि भा सुखी समाज ॥

mana prasanna kara sakuca taji, kahahu karaum̐ soi āja |
satyasandha raghubara bacana, suni bhā sukhī samāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0