अयोध्याकाण्ड

अध्याय 265: देवताओं का भय और बृहस्पति की सलाह

5 श्लोक · 265 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

देवताओं का भय और बृहस्पति की सलाह

देवताओं सहित इन्द्र भयभीत होकर सोचते हैं कि काम बिगड़ना चाहता है। कोई उपाय नहीं बनता, तब सब मन ही मन राम की शरण जाते हैं। फिर आपस में कहते हैं, रघुपति भक्तों की भक्ति के वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासा की याद करके वे निराश हो जाते हैं। प्रह्लाद ने ही नरसिंह को प्रकट किया था। वे एक दूसरे के कान लगकर सिर धुनकर कहते हैं, अब देवताओं का काम भरत के हाथ है। राम अपने सेवक की सेवा मानते हैं। इसलिए प्रेम से भरत का स्मरण करो, जो अपने गुण और शील से राम को वश में करते हैं। देवताओं का मत सुनकर देवगुरु कहते हैं, भला है, तुम्हारा बड़ा भाग्य है। भरत के चरणों का अनुराग जग में सब मंगलों की जड़ है।

265.1

सुर-गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिँ चाहत होन अकाजू ॥
बनत उपाउ करत कछु नाहीॅं । राम-सरन सब गे मन माहीँ ॥

sura-gana sahita sabhaya surarājū | socahim̐ cāhata hona akājū ||
banata upāu karata kachu nāhīॅṃ | rāma-sarana saba ge mana māhīm̐ ||

265.2

बहुरि बिचारि परसपर कहहीँ । रघुपति भगत-भगति बस अहहीँ ॥
सुधि करि अम्बरीष दुरबासा । भे सुर-सुरपति निपट निरासा ॥

bahuri bicāri parasapara kahahīm̐ | raghupati bhagata-bhagati basa ahahīm̐ ||
sudhi kari ambarīṣa durabāsā | bhe sura-surapati nipaṭa nirāsā ||

265.3

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किये प्रगट प्रहलादा ॥
लगि लगि कान कहहिँ धुनि माथा । अब सुर-काज भरत के हाथा ॥

sahe suranha bahu kāla biṣādā | narahari kiye pragaṭa prahalādā ||
lagi lagi kāna kahahim̐ dhuni māthā | aba sura-kāja bharata ke hāthā ||

265.4

आन उपाउ न देखिय देवा । मानत राम सुसेवक सेवा ॥
हियँ सपेम सुमिरहु सम भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥

āna upāu na dekhiya devā | mānata rāma susevaka sevā ||
hiyam̐ sapema sumirahu sama bharatahi | nija guna sīla rāma basa karatahi ||

दो॰ 265दोहा

सुनि सुर-मत सुरगुरु कहेउ, भल तुम्हार बड़ भाग ।
सकल सुमगंल मूल जग, भरत चरन अनुराग ॥

suni sura-mata suraguru kaheu, bhala tumhāra bar̤a bhāga |
sakala sumagaṃla mūla jaga, bharata carana anurāga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0