अयोध्याकाण्ड

अध्याय 263: राम भरत को सांत्वना देकर निर्दोष बताते हैं

5 श्लोक · 263 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम भरत को सांत्वना देकर निर्दोष बताते हैं

पीड़ा, प्रीति, विनय और नीति से सनी भरत की श्रेष्ठ वाणी सुनकर सारी सभा शोक में डूब जाती है, मानो कमलवन पर पाला पड़ गया हो। ज्ञानी मुनि अनेक प्रकार की पुरानी कथाएँ कहकर भरत को समझाते हैं। फिर सूर्यकुल रूपी कुमुदवन के चन्द्रमा रघुनन्दन उचित वचन बोलते हैं। तात, व्यर्थ ग्लानि मत करो, जीव की गति ईश्वर के अधीन जानो। मेरे मत में तीनों काल और तीनों लोकों के पुण्यश्लोक लोग तुमसे नीचे हैं। जो तुम पर कुटिलता का भाव मन में लाता है, उसका लोक और परलोक नष्ट हो जाता है। माता को दोष वही जड़ देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुसभा का सेवन नहीं किया। तुम्हारा नाम स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच और अमंगल का भार मिट जाएगा, लोक में सुयश और परलोक में सुख मिलेगा।

263.1

सुनि अति बिकल भरत बर बानी । आरति-प्रीति-बिनय-नय सानी ॥
सोक मगन सब सभाँ खभारू । मनहुँ कमल-बन परेउ तुसारू ॥

suni ati bikala bharata bara bānī | ārati-prīti-binaya-naya sānī ||
soka magana saba sabhām̐ khabhārū | manahum̐ kamala-bana pareu tusārū ||

263.2

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी । भरत प्रबोध कीन्ह, मुनि-ज्ञानी ॥
बोले उचित बचन रघुनन्दू । दिनकर-कुल-कैरव-बन-चन्दू ॥

kahi aneka bidhi kathā purānī | bharata prabodha kīnha, muni-jñānī ||
bole ucita bacana raghunandū | dinakara-kula-kairava-bana-candū ||

263.3

तात जाय जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥
तीनि-काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरे ॥

tāta jāya jiyam̐ karahu galānī | īsa adhīna jīva gati jānī ||
tīni-kāla tibhuana mata moreṃ | punyasiloka tāta tara tore ||

263.4

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोक-परलोक नसाई ॥
दोस देहिँ जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुरु-साधु सभा नहिँ सेई ॥

ura ānata tumha para kuṭilāī | jāi loka-paraloka nasāī ||
dosa dehim̐ jananihi jar̤a teī | jinha guru-sādhu sabhā nahim̐ seī ||

दो॰ 263दोहा

मिटिहहिं पाप प्रपञ्च सब, अखिल अमङ्गल भार ।
लोक सुजस परलोक सुख, सुमिरत नाम तुम्हार ॥

miṭihahiṃ pāpa prapañca saba, akhila amaṅgala bhāra |
loka sujasa paraloka sukha, sumirata nāma tumhāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0