अयोध्याकाण्ड

अध्याय 262: भरत अपने कारण हुए दुख गिनाते हैं

5 श्लोक · 262 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत अपने कारण हुए दुख गिनाते हैं

राजा ने मरकर प्रेम का प्रण रखा और माता की कुमति का सारा जगत साक्षी है। माताओं की व्याकुलता देखी नहीं जाती। सारे अनर्थ की जड़ मैं हूँ, यह सुनकर और समझकर मैंने सब शूल सहे। सुना कि रघुनाथ मुनिवेष धरकर लक्ष्मण और सीता के साथ बिना जूतों के पैदल वन गए। शंकर साक्षी हैं, मैं इस घाव से भी जीता रहा। फिर निषाद का स्नेह देखकर भी यह वज्र जैसा कठोर हृदय नहीं फटा। अब आकर सब आँखों से देख लिया, यह जड़ जीव जीते जी सब सहता है। जिन्हें देखकर मार्ग की साँपिनें और बिच्छू भी अपना तीखा विष छोड़ देते हैं, वे रघुनन्दन, लक्ष्मण और सीता जिसे शत्रु लगे, उसके पुत्र को छोड़कर दैव यह असह दुख किसे सहाए?

262.1

भूपति-मरन पेम पनु राखी । जननी कुमति जगत सब साखी ॥
देखि न जाहिँ बिकल महतारी । जरहिं दुसह जर पुर-नर-नारी ॥

bhūpati-marana pema panu rākhī | jananī kumati jagata saba sākhī ||
dekhi na jāhim̐ bikala mahatārī | jarahiṃ dusaha jara pura-nara-nārī ||

262.2

महीं सकल अनरथ कर मूला । सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ॥
सुनि बन-गवन कीन्ह रघुनाथा । करि मुनि बेष लखन-सिय साथा ॥

mahīṃ sakala anaratha kara mūlā | so suni samujhi sahium̐ saba sūlā ||
suni bana-gavana kīnha raghunāthā | kari muni beṣa lakhana-siya sāthā ||

262.3

बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाये । संकर साखि रहेउँ एहि घाये ॥
बहुरि निहारि निषाद सनेहू । कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ॥

binu pānahinha payādehi pāye | saṃkara sākhi raheum̐ ehi ghāye ||
bahuri nihāri niṣāda sanehū | kulisa kaṭhina ura bhayau na behū ||

262.4

अब सब आँखिन्ह देखेउं आई । जिअत जीव जड़ सबइ सहाई ॥
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । तजहिं विषम बिषु तामस तीछी ॥

aba saba ām̐khinha dekheuṃ āī | jiata jīva jar̤a sabai sahāī ||
jinhahi nirakhi maga sām̐pini bīchī | tajahiṃ viṣama biṣu tāmasa tīchī ||

दो॰ 262दोहा

तेइ रघुनन्दन-लखन-सिय, अनहित लागे जाहि ।
तासु तनय तजि दुसह दुख, दैउ सहावइ काहि ॥

tei raghunandana-lakhana-siya, anahita lāge jāhi |
tāsu tanaya taji dusaha dukha, daiu sahāvai kāhi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0