मुनि के वचन सुनकर और राम का रुख पाकर भरत गुरु और स्वामी को पूरी तरह अनुकूल पाते हैं। फिर पुलकित शरीर से सभा में खड़े होते हैं, कमल नेत्रों में प्रेम के आँसू उमड़ आते हैं। मुनिनाथ ने मेरा कहना निबाह दिया, इससे अधिक मैं क्या कहूँ? मैं अपने स्वामी का स्वभाव जानता हूँ, वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। खेल में भी मैंने उन्हें कभी रूठे नहीं देखा। बचपन से उन्होंने साथ नहीं छोड़ा, कभी मेरा मन नहीं तोड़ा। खेल में हारने पर भी वे मुझे जिता देते थे। स्नेह और संकोच से मैंने कभी सामने बात नहीं की, आज तक मेरे प्रेम के प्यासे नेत्र दर्शन से तृप्त नहीं हुए।