अयोध्याकाण्ड

अध्याय 259: राम भरत की बड़ाई करते हैं

5 श्लोक · 259 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम भरत की बड़ाई करते हैं

भरत पर गुरु का अनुराग देखकर राम के हृदय में विशेष आनंद होता है। भरत को धर्मधुरंधर और तन, मन, वचन से अपना सेवक जानकर वे गुरु की आज्ञा के अनुकूल कोमल मंगल वचन बोलते हैं। नाथ, आपकी शपथ और पिता के चरणों की दुहाई, संसार में भरत जैसा भाई नहीं हुआ। जो गुरु के चरणकमलों के प्रेमी हैं, वे लोक और वेद में बड़भागी हैं, फिर जिस पर आपका ऐसा अनुराग है, उस भरत का भाग्य कौन कहे? छोटे भाई की मुँह पर बड़ाई करते बुद्धि सकुचाती है, इसलिए राम यह कहकर चुप हो जाते हैं कि भरत जो कहें वही करने में भलाई है। तब मुनि भरत से कहते हैं, तात, सब संकोच छोड़कर कृपासिन्धु प्रिय भाई से मन की बात कहो।

259.1

गुरु अनुराग भरत पर देखी । राम-हृदय आनन्द बिसेखी ॥
भरतहि धरम-धुरन्धर जानी । निज-सेवक-तन-मानस बानी ॥

guru anurāga bharata para dekhī | rāma-hṛdaya ānanda bisekhī ||
bharatahi dharama-dhurandhara jānī | nija-sevaka-tana-mānasa bānī ||

259.2

बोले गुरु आयसु अनुकूला । बचन मञ्जु मृदु मगंल-मूला ॥
नाथ सपथ पितु-चरन दोहाई । भयउ न भुवन भरत सम भाई ॥

bole guru āyasu anukūlā | bacana mañju mṛdu magaṃla-mūlā ||
nātha sapatha pitu-carana dohāī | bhayau na bhuvana bharata sama bhāī ||

259.3

जे गुरु-पद-अम्बुज अनुरागी । ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥
राउर जा पर अस अनुरागू । को कहि सकइ भरत कर भागू ॥

je guru-pada-ambuja anurāgī | te lokahum̐ bedahum̐ bar̤abhāgī ||
rāura jā para asa anurāgū | ko kahi sakai bharata kara bhāgū ||

259.4

लखि लघु-बन्धु बुद्धि सकुचाई । करत बदन पर भरत बड़ाई ॥
भरतु कहहिं सोइ किये भलाई । अस कहि राम रहे अरगाई ॥

lakhi laghu-bandhu buddhi sakucāī | karata badana para bharata bar̤āī ||
bharatu kahahiṃ soi kiye bhalāī | asa kahi rāma rahe aragāī ||

दो॰ 259दोहा

तब मुनि बोले भरत सन, सब सकोच तजि तात ।
कृपासिन्धु प्रिय बन्धु सन, कहहु हृदय कै बात ॥

taba muni bole bharata sana, saba sakoca taji tāta |
kṛpāsindhu priya bandhu sana, kahahu hṛdaya kai bāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0