अयोध्याकाण्ड

अध्याय 25: दशरथ ने कैकेयी को कोप में पाया

6 श्लोक · 25 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

दशरथ ने कैकेयी को कोप में पाया

कोपभवन का नाम सुनकर राजा सकुचा गए, डर से पैर आगे नहीं पड़ते। जिनकी भुजाओं के बल पर इन्द्र बसते हैं और सब राजा जिनका रुख देखते हैं, वे स्त्री का क्रोध सुनकर सूख गए। कामदेव का प्रताप ऐसा है कि वज्र और तलवार सहने वाले फूलों के बाण से मारे गए। राजा ने देखा कि प्रिया भूमि पर मोटा पुराना कपड़ा ओढ़े पड़ी है, गहने उतार फेंके हैं, मानो होनी वैधव्य की सूचना दे रही हो। कोमल वाणी से कारण पूछने पर वह हाथ झटक देती है और क्रुद्ध नागिन की तरह देखती है। दोनों वासनाएँ उसकी जीभ और वरदान दाँत हैं, वह मर्मस्थान ढूँढ रही है। होनी के वश राजा इसे काम का खेल समझते हैं और बार-बार कारण पूछते हैं।

25.1

कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ । भय-बस अगहुड़ परइ न पाऊ ॥
सुरपति बसइ बाँह-चल जाके । नरपति सकल रहहिँ रुख ताकें ॥

kopabhavana suni sakuceu rāū | bhaya-basa agahur̤a parai na pāū ||
surapati basai bām̐ha-cala jāke | narapati sakala rahahim̐ rukha tākeṃ ||

25.2

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई । देखहु काम प्रताप बड़ाई ॥
सूल कुलिस असि अंगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन-सर मारे ॥

so suni tiya risa gayau sukhāī | dekhahu kāma pratāpa bar̤āī ||
sūla kulisa asi aṃgavanihāre | te ratinātha sumana-sara māre ||

25.3

सभय नरेस प्रिया पहिँ गयऊ । देखि दसा दुख दारुन भयऊ ॥
भूमि-सयन पट मोट पुराना । दिये डारि तन भूषन नाना ॥

sabhaya naresa priyā pahim̐ gayaū | dekhi dasā dukha dāruna bhayaū ||
bhūmi-sayana paṭa moṭa purānā | diye ḍāri tana bhūṣana nānā ||

25.4

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी । अन-अहिवात सूच जनु भाबी ॥
जाइ निकट नृप कह मृदु बानी । प्रान-प्रिया केहि हेतु रिसानी ॥

kumatihi kasi kubeṣatā phābī | ana-ahivāta sūca janu bhābī ||
jāi nikaṭa nṛpa kaha mṛdu bānī | prāna-priyā kehi hetu risānī ||

25.छं॰ 1छन्द

केहि हेतु रानि रिसानि परसत, पानि पतिहि नेवारई ।
मानहुँ सरोष भुअङ्ग-भामिनि, बिषम भाँति निहारई ॥
दोउ बासना-रसना दसन बर, मरम ठाहर देखई ।
तुलसी नृपति भवतब्यता-बस, काम-कौतुक लेखई ॥

kehi hetu rāni risāni parasata, pāni patihi nevāraī |
mānahum̐ saroṣa bhuaṅga-bhāmini, biṣama bhām̐ti nihāraī ||
dou bāsanā-rasanā dasana bara, marama ṭhāhara dekhaī |
tulasī nṛpati bhavatabyatā-basa, kāma-kautuka lekhaī ||

25.सो॰ 25सोरठा

बार बार कह राउ, सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि ।
कारन मोहि सुनाउ, गज-गामिनि निज कोप कर ॥

bāra bāra kaha rāu, sumukhi sulocini pikabacani |
kārana mohi sunāu, gaja-gāmini nija kopa kara ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0