अयोध्याकाण्ड

अध्याय 24: बालसखाओं का हर्ष, राजा कैकेयी के घर

5 श्लोक · 24 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

बालसखाओं का हर्ष, राजा कैकेयी के घर

यह समाचार सुनकर श्रीराम के बालसखा हर्षित हुए और दस-पाँच मिलकर उनके पास गए। प्रेम पहचानकर प्रभु ने उनका आदर किया और कोमल वाणी से कुशल पूछी। लौटते हुए वे आपस में बड़ाई करते हैं: श्रीरघुवीर के समान शील और स्नेह निभाने वाला संसार में कौन है? हे ईश्वर, कर्मवश हम जिस योनि में भटकें, हमें यही देना कि हम सेवक हों और सीतापति स्वामी, और यह नाता निभे। पूरे नगर की यही अभिलाषा है, पर कैकय की पुत्री के हृदय में बड़ी जलन है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता? नीच की सलाह से चतुराई नहीं रहती। साँझ को आनन्दित राजा कैकेयी के महल गए, मानो स्नेह देह धरकर निठुरता के पास गया हो।

24.1

बाल सखा सुन हियँ हरषाहीँ । मिलि दस पाँच राम पहिँ जाहीँ ॥
प्रभु आदरहिं प्रेम पहिचानी । पूँछहिं कुसल-षेम मृदु बानी ॥

bāla sakhā suna hiyam̐ haraṣāhīm̐ | mili dasa pām̐ca rāma pahim̐ jāhīm̐ ||
prabhu ādarahiṃ prema pahicānī | pūm̐chahiṃ kusala-ṣema mṛdu bānī ||

24.2

फिरहिँ भवन प्रिय आयसु पाई । करत परसपर राम बड़ाई ॥
को रघुबीर सरिस संसारा । सील सनेह निबाहनिहारा ॥

phirahim̐ bhavana priya āyasu pāī | karata parasapara rāma bar̤āī ||
ko raghubīra sarisa saṃsārā | sīla saneha nibāhanihārā ||

24.3

जेहि जेहि जोनि करम-बस भ्रमहीँ । तहँ तहँ ईस देहु यह हमहीँ ॥
सेवक हम स्वामी सिय-नाहू । होउ नात यह ओर निबाहू ॥

jehi jehi joni karama-basa bhramahīm̐ | taham̐ taham̐ īsa dehu yaha hamahīm̐ ||
sevaka hama svāmī siya-nāhū | hou nāta yaha ora nibāhū ||

24.4

अस अभिलाष नगर सब काहू । कैकय-सुता हृदय अति दाहू ॥
को न कुसङ्गति पाइ नसाई । रहइ न नीच-मतें चतुराई ॥

asa abhilāṣa nagara saba kāhū | kaikaya-sutā hṛdaya ati dāhū ||
ko na kusaṅgati pāi nasāī | rahai na nīca-mateṃ caturāī ||

दो॰ 24दोहा

साँस समय सानन्द नृप, गयउ कैकेई गेहँ ।
गवन निठुरता निकट किय, जनु धरि देह सनेहँ ॥

sām̐sa samaya sānanda nṛpa, gayau kaikeī geham̐ |
gavana niṭhuratā nikaṭa kiya, janu dhari deha saneham̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0